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गुरुवार, 29 मार्च 2012

ध्यान का महत्त्व

ध्यान का महत्त्व
आप सभी ने प्रायः देखा होगा की मन्त्र जप करने से पूर्व शास्त्रों में विनियोग, न्यास, ध्यान आदि का वर्णन होता है। इनका क्या प्रयोजन है?
ध्यान-
स्थूल ध्यान द्वारा सूक्ष्म का बोध होता है। ‘कुलार्णव तन्त्र’ में स्पष्ट कहा गया है कि -’जिस प्रकार गायों के सारे शरीर में व्याप्त दूध उनके स्तन से स्त्रवित होता है, उसी प्रकार सर्वत्र व्याप्त देवता प्रतिमाओं में विराजमान रहता है। प्रतिमा-रुपी बिम्ब के ध्यान-पूजन और विश्वास से देवता का सामीप्य मिलता है। जिस प्रकार गाय का घी शरीर में स्थित रहते हुए स्वतः पुष्टि-कारक नहीं होता अपितु परिश्रम के द्वारा वह पुष्टि-कारक होता है। ठीक उसी प्रकार शरीरों में स्थित परमेश्वरी ध्यान-पूजन के बिना मनुष्यों को फल नहीं देती।
अतः हम सभी को चाहिए कि परमेश्वरी के अनन्त रुपों में से किसी एक रुप को ‘इष्ट’ के रुप में स्वीकार कर, नित्य उसका स्मरण-ध्यान-पूजन-जप करें। इससे ही हम जन्म-मरण-दुःखादि से छूट सकते हैं।
‘ध्यान” के विषय में शास्त्रों में लिखा है कि– अपने मन को सांसारिक बातों से समेटकर ध्यान करें। तब तक ध्यान करें, जब तक मूर्त्त-रुप का मन में प्रत्यक्ष होना स्थिर न हो जाए। चलते हुए अथवा अन्य कार्य करते हुए यदि वरण किया हुआ मूर्त्त-रुप मन से न मिटे, तो ध्यान सिद्ध समझना चाहिए।
‘ध्यान’ के सिद्ध होने पर मूर्त्त-रुप के गुण साधक में प्रकट होने लगते हैं और साधक जन्म-मरण-दुःखादि आदि से मुक्त हो जाता है।

सोमवार, 15 अगस्त 2011

पूजा के साथ सेहत के लिए भी चमत्कारी 'ॐ'

'ॐ' किसी धर्म से जुड़ा न होकर ध्वनिमूलक है। माना जाता है कि सृष्टि के आरंभ में केवल यही एक ध्वनि ब्रह्मांड में गूँजती थी। जब हम 'ॐ' बोलते हैं, तो वस्तुतः हम तीन वर्णों का उच्चारण करते हैं: 'ओ', 'उ' तथा 'म'। 'ओ' मस्तिष्क से, 'उ' हृदय से तथा 'म' नाभि (जीवन) से जुड़ा है। मन, मस्तिष्क और जीवन के तारतम्य से ही कोई भी काम सफल होता है। 'ॐ' के सतत उच्चारण से इन तीनों में एक रिदम आ जाती है

जब यह तारतम्य आ जाता है, तो व्यक्ति का व्यक्तित्व पूर्ण हो जाता है। उसका आभामंडल शक्तिशाली हो जाता है, इंद्रियाँ अंतरमुखी हो जाती हैं। जैसे किसी पेड़ को ऊँचा उठने के लिए जमीन की गहराइयों तक जाना पड़ता है, ठीक उसी तरह व्यक्ति को अपने भीतर की गहराइयों में झाँकने हेतु (अपने संपूर्ण विकास के लिए) 'ॐ' का सतत जाप बहुत मदद करता है। ॐ आध्यात्मिक साधना है। इससे हम विपदा, कष्ट, विघ्नों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।


'ॐ' के जाप से वह स्थान जहाँ जाप किया जा रहा है, तरंगित होकर पवित्र एवं सकारात्मक हो जाता है। इसके अभ्यास से जीवन की गुत्थियाँ सुलझती हैं तथा आत्मज्ञान होने लगता है। मनुष्य के मन में एकाग्रता, वैराग्य, सात्विक भाव, भक्ति, शांति एवं आशा का संचार होता है। इससे आध्यात्मिक ऊँचाइयाँ प्राप्त होती हैं। 'ॐ' से तनाव, निराशा, क्रोध दूर होते हैं। मन, मस्तिष्क, शरीर स्वस्थ होते हैं। गले व साँस की बीमारियों, थायरॉइड समस्या, अनिद्रा, उच्च रक्तचाप, स्त्री रोग, अपच, वायु विकार, दमा व पेट की बीमारियों में यह लाभदायक है। विद्यार्थियों को परीक्षा में सफलता हेतु एकाग्रता दिलाने में भी यह सहायक है। इन दिनों पश्चिमी देशों में नशे की लत छुड़ाने में भी 'ॐ' के उच्चार का प्रयोग किया जा रहा है।

ध्यान, प्राणायाम, योगनिद्रा, योग आदि सभी को 'ॐ' के उच्चारण के बाद ही शुरू किया जाता है। मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिए दिन में कम से कम 21 बार 'ॐ' का उच्चारण करना चाहिए।