मसाज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मसाज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

भृंगराज तेल (Bhringaraj Oil) बालों को बनाये स्वस्थ व मजबूत

भृंगराज तेल ब्राह्मी के प्रयोग से बनने वाला यह तेल बालों को स्वास्थ प्रदान करने के साथ-साथ स्मरणशक्ति बढ़ाने वाला तथा मस्तिष्क की कमज़ोरी भी दूर करता है. इसकी निर्माण विधि एंव उपयोग प्रस्तुत है. भृंगराज एक प्रकार का हर्ब है. जिनको आयुर्वेद रसायन मानता है, जो बढ़ते उम्र के लक्षणों को देर से आने और नवजीवन प्रदान करने में बहुत सहायता करता है. इन सबमें सबसे अच्छी बात इस तेल को लगाने से बालों का झड़ना कम तो होता ही है. साथ ही नए बाल भी उगते हैं.

भृंगराज तेल बनाने के लिए सामग्री – Ingredients For Bhringaraj Oil


  1. भांगरे का रस ढाई लिटर
  2. ब्राह्मी का रस सवा तीन सौ ग्राम
  3. आंवले का रस सवा तीन सौ ग्राम
  4. तिल का तेल पौने दो सौ ग्राम
  5. हरड़, बहेड़ा, आंवला, नागरमोथा, कचूर, लोध्र, मजीठ, बावची, बरियारा के फूल, चन्दन, पदमाख अनन्त मूल, मण्डूर, मेहंदी, प्रियंगु, मुलेठी, जटामांसी और कूठ – सब 10 – 10 ग्राम.

भृंगराज तेल बनाने की विधि – How To Build Bhringaraj Oil

इन औषधियों को पीस कर लुगदी बना लें. और तीनों रस तथा तेल में मिला कर मन्दी आंच पर पकाएं.
जब सिर्फ़ तेल बचे. तब उतार कर छान लें. ठण्डा करके बोतलों में भर लें.

भृंगराज तेल उपयोग करने का तरीका – How To Use Bhringaraj Oil

यह भृंगराज तेल रोज़ाना सोते समय बालों की जड़ों में लगाकर 15 -20 मिनट हल्के हाथ से मालिश करने से बाल झड़ना और पकना (सफ़ेद होना) बन्द होता है. सिर दर्द नहीं होती. सिर में खुश्क़ी व रूसी नहीं होती. बाल घने, लम्बे, काले और चमकीले बने रहते है. दिमाग़ में ठण्डक और शान्ति बने रहते है.

भृंगराज तेल प्रयोग करने के लाभ – Benefits of Bhringaraj Oil

बालों का विकास होता है और बाल स्वस्थ बनते हैं- आयुर्वेद के अनुसार बाल तब झड़ते हैं जब शरीर में पित्त बढ़ जाता है और भृंगराज इसको शांत करके बालों को बढ़ने और उगने में मदद करते हैं। इस तेल को लगाने से खोपड़ी में रक्त का संचार अच्छी तरह से हो पाता है। भृंगराज तेल के साथ आंवला और शिकाकाई को मिलाने से वह और भी प्रभावकारी रूप से काम कर पाता है।
रूसी को ख़तम करे और असमय बालों का सफेद होना रोकता है- रोजाना भृंगराज तेल से मसाज़ करने पर स्कैल्प में किसी भी प्रकार का इंफेक्शन नहीं होता है। फलस्वरूप रूसी नहीं हो पाता है और बालों का नैचुरल रंग बना रहता है।
तनाव से मुक्त करता है- आयुर्वेद के अनुसार शरीर में पित्त के बढ़ने के कारण भी तनाव होता है। भृंगराज इस मामले में बहुत काम आता है। जिन लोगों के बाल तनाव के कारण गिर रहे हैं, उनके लिए ये तेल प्रभावकारी रूप से काम करता है।

सोमवार, 15 अगस्त 2011

मालिश की कार्य प्रणाली

परिचय-

प्राचीनकाल से ही मनुष्य मालिश को अपने अच्छे स्वास्थ्य के लिए इस्तेमाल करता आ रहा है। भारत में ही नहीं, विश्व के अन्य देशों में भी मालिश का उपयोग बहुत पहले से होता आ रहा है। कई हजार साल पहले चीन मे मालिश को बहुत महत्त्व दिया जाता था तथा इसे रोगों को दूर करने की अचूक पद्धति माना जाता था। चीन के लोगों का मानना था कि शरीर को स्वस्थ और सुन्दर रखने में मालिश बहुत सहायक सिद्ध होती है। जो लोग मालिश करते थे, उन्हें समाज में बड़ा आदर-सम्मान मिलता था। आज जो आदर व सम्मान डॉक्टरों को प्राप्त है, वही आदर-सम्मान उस समय मालिश-विशेषज्ञों को प्राप्त था।

जापान ने चीन से यह विद्या सीखी तथा उसे अपने देश के कोने-कोने तक पहुंचाया। इन देशों में आज भी मालिश का विशेष स्थान है। जापान में मालिश करने का ढंग सबसे अलग है। वहां चिकोटी भरना, मुक्के मारना और कसकर हाथ से रगड़ना आदि अनेकों प्रकार से मालिश की जाती है। आराम से या हल्के से मालिश करना न उन्हें आता है और न ही उन्हें इस प्रकार से मालिश करने से कोई सुख मिलता है।

भारत, चीन और जापान के अलावा यूनान, रोम, तुर्की, मिस्त्र और फारस जैसे देश भी मालिश की महत्ता को जानते थे तथा उसका उपयोग करते थे। ईसा से 500 साल पहले जिम्नास्टिक का आविष्कार करने वाले `हीरोडिक्स´ अपने रोगियों को मालिश कराने का सुझाव देते थे। ईसा से 460 साल पहले यूनान के पास स्थित कासद्वीप में जन्मे तथा कुछ आधुनिक दवाइयों के आविष्कारक हिप्पोकेटीज ने भी अपने ग्रंथों में मालिश के गुणों को बढ़ चढ़कर बताया है। उन्होंने मालिश द्वारा कई प्रकार के रोगों को दूर करने के उपचार भी बताए है। यूनानियों के प्राचीन साहित्य, उनके बुतों और चित्रों को देखकर आसानी ही अनुमान लगाया जा सकता है कि वे मालिश के किस कदर शौकीन रहें होगे। मालिश और व्यायाम ही उनके अच्छे और स्वस्थ शरीर का राज था। यह भी कहा जाता है कि उन्हें मालिश तथा व्यायाम का बहुत शौक था। बाद में स्त्रियों से मालिश कराने की प्रथा चल पड़ी। यूनान के होमर नामक एक प्रसिद्व कवि ने अपने `ओडिसी´ नामक महाकाव्य में मालिश की लोकिप्रयता का वर्णन किया है तथा लिखा है कि उस समय जब योद्धा युद्ध के मैदान से लौटकर आते थे, तो उनकी पत्नियां तथा दासियां उनके शरीर की मालिश किया करती थीं। शरीर की थकावट और कसावट को दूर करने के लिए हल्की थपकी के रूप में उनकी मालिश की जाती थीं।

इतिहास में देखने से पता चलता है कि इन देशों में जब योद्धा युद्ध के बाद वापस घर लौटते थे तो स्त्रियों से अपने शरीर की मालिश कराते थे। उस समय इन देशों में दास-प्रथा का भी प्रचलन था। राजा-महाराजा अपने शरीर को सुन्दर और बलिष्ठ बनाने के लिए अपनी खूब मालिश कराया करते थे। जिससे उनका शरीर सुन्दर और सुडौल यानी आकर्षक हो जाता था। सुन्दर और स्वस्थ शरीर को गर्व का प्रतीक माना जाता था।

एक यूनानी चिकित्सक ने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम के साथ मालिश करने की आवश्यकता के बारे में काफी विस्तार से बताया था।

ईसा से काफी साल पहले इस मशहूर राजा न्यूरेल्जिया (नाड़ी-संस्थान का एक रोग) से पीड़ित था। वह इस रोग से निजात पाने के लिए प्रतिदिन अपने शरीर पर एक खास किस्म की मालिश कराया करता था।

एक रोमन डॉक्टर ने बताया था कि सूरज के प्रकाश में खड़ें होकर मालिश कराने से पुराने दर्द और बीमारियों आदि से छुटकारा पाया जा सकता है। साथ ही उसने यह भी बताया था कि अधंरग (शरीर के आधे भाग में लकवा आना) आदि रोगों से ग्रस्त टांगों, बाजुओं आदि को शक्ति देने तथा उनमे जान पैदा करने के लिए मालिश करना बहुत लाभदायक होता है। उसका मानना था कि इससे रोग जल्दी ठीक हो जाते हैं।

तुर्क लोग स्नान करने से पहले अपने शरीर की मालिश किया करते थे, परन्तु यह मालिश वैज्ञानिक ढंग की न होकर साधारण होती थी। प्राचीनकाल में अफ्रीकी लोगों में विवाह से 1 महीने पहले से वर-वधू की प्रतिदिन मालिश करने की प्रथा थी। उनका मानना था कि इससे यौवन फूट पड़ता है, जो सच भी है। हमारे देश में भी ऐसी ही एक प्रथा पाई जाती है, जिसे हल्दी की रस्म कहते है। काफी हजार साल पहले मेडागास्कर नामक अफ्रीकी जंगली जाति के लोग रोगियों के शरीर में खून के दौरे (रक्त-संचार) के लिए मालिश का उपयोग किया करते थे।

पुराने समय में मिस्रवासियों को मालिश का बहुत बड़ा विशेषज्ञ माना जाता था। मिस्रवासियों ने ही रोमनों तथा यूनानियों को मालिश की कला सिखाई थी। मिस्र की एक बहुत प्रसिद्ध रानी अपने बालों में जैतून के तेल की मालिश कराया करती थी जिस कारण उसके बाल अपने समय के बहुत ही आकर्षक तथा सौन्दर्य-सम्पन्न बाल थे। एक बहुत ही महान विद्वान ने लिखा है कि आधुनिक शब्द `मसाज´ अरबी शब्द `मास´ से बना है, जिसका अर्थ मांसपेशियों को हाथ से दबाने तथा जोड़ों पर मालिश करने की एक कला है। यह अंगों को लचीला और कर्मशील बनाने तथा आलस्य को समाप्त करके शरीर में फुर्ती का संचार करता है।

फ्रांसीसियों ने मालिश करने की कला अरबवासियों से सीखी थी, जिसे उन्होंने अपने देश और अन्य यूरोपीय देशों तक पहुंचाया।

इतिहास से यह भी पता चलता है कि हीरोनिमस फेबरीक्स ए.बी. एक्यूपेण्डट (1537-1619) ने यूरोप में मालिश के चिकित्सात्मक पहलू के महत्त्व को दोबारा जीवित किया था। पेरासेल्सस नामक एक लेखक ने अपनी पुस्तक द मेडिसिन अगियपशन -1591 में मालिश करने की अनेक विधियों को विभिन्न प्रयोगों के द्वारा समझाने की कोशिश की है।

उसके यह अनुभव मिस्र में प्रचलित मालिश की पद्धति पर आधारित थे। इसके अलावा अनेक फ्रांसीसी लेखकों ने भी मालिश को अपने साहित्य में स्थान दिया है। सन् 1818 में प्रकाशित फ्रांस के पहले विश्व-कोष में पियोरे ने मालिश के गुणों पर एक विस्तृत विवेचना की है।

इंग्लैण्ड के इतिहास से पता चलता है कि वहां मालिश का प्रयोग प्राय: चिकित्सा की दृष्टि से ही होता रहा है तथा वहां मालिश मेडिकल रबिंग नाम से जानी जाती है। कहा जाता है कि वहां मालिश करने वाले वेतन पर काम किया करते थे और धनी और बड़े जमींदारों के यहां स्थाई तौर पर मालिश करते थे।

सन् 1863 में मालिश पर आधारित एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी जो लोगों द्वारा बहुत पसन्द की गई तथा बहुत अधिक संख्या में बिकी भी थी। परगैमस के `स्कूल ऑफ ग्लेडियेटर´ के एक डॉक्टर गैलेन, 1830 ने व्यायाम से पहले शरीर को तैयार करने के लिए तब तक रगड़ने का नियम निकाला था, जब तक कि शरीर लाल न हो जाए।

एक महान चिकित्सक ने लगभग सन 1575 में मोटापा दूर करने, रक्त-संचार (खून का बहाव) बढ़ाने और जोड़ों के स्थानांतरित हो जाने पर उन्हें उनके स्थान पर लाने आदि के लिए हल्की और तेज मालिश का आविष्कार किया था, जिसके परिणाम उनकी आशा के साथ ठीक मिले थे।

फारस के बादशाह का डॉक्टर हॉफमैन ने भी मालिश और व्यायाम करने पर बहुत जोर दिया करता था। उसका मानना था कि इससे शरीर स्वस्थ रहता है, रोगों से छुटकारा मिलता है तथा शरीर की रोगों से लड़ने की शक्ति में बढ़ोत्तरी होती है।

ऑक्सफोर्ड के सर्जन ग्रासवेनर ने मालिश द्वारा जोड़ों के दर्द तथा अकड़न का सफल इलाज करके ख्याति प्राप्त की थी। उन्हीं दिनों लगभग 1800 ई. में एडिनबरा के मिस्टर बॉलफोर ने मालिश, ठोकना और दबाव क्रिया से गठिया, जोड़ों के दर्द और अनेक प्रकार की बीमारियों को ठीक किया था।

सन् 1813 में स्टॉकहोम में रॉयल इंस्टीट्यूट स्थापित की गई और डॉक्टर पीटर हैनरी लिंग ने मालिश करने के लिए एक नए ढंग की खोज की। बाद में यह पद्धति मालिश के नाम से प्रसिद्ध हुई। उन्होंने मालिश को वैज्ञानिक रूप दिया तथा शरीर-रचना के अनुसार उपयुक्त मालिश करने की पद्धति आरम्भ की। कहा जाता है कि हैनरी लिंग ने मालिश करने के नए ढंग की खोज निकालने में चीनी ग्रंथ कांग फो से सहायता ली थी और हैनरी लिंग ही वह व्यक्ति थे, जिन्होंने स्वदेशी जिमनास्टिक पद्धति का आविष्कार किया था। हैनरी लिंग ने मालिश को मुख्य रूप से 3 भागों में बांटा गया है।

पहला- सक्रिय अंग-विक्षेप (एक्टिव मूवमेंट्स), दूसरा- निष्क्रिय अंग-विक्षेप (पैसिव मूवमेंट्स) और तीसरा- दुष्क्रिय अंग-विक्षेप (रेजिस्टिव मूवमेंट्स)।

  • सक्रिय अंग-विक्षेप :- तेल से या सूखे हाथों से पूरे ‘शरीर की मालिश की जाती है या मांसपेशियों को रगड़कर कोमल बनाया जाता है।
  • निष्क्रिय अंग-विक्षेप :- हल्की थपकी, कंपन और ताल आदि क्रियाओं के माध्यम से जोड़ों, रक्त की नलिकाओं और नाड़ी-तन्त्र पर प्रभाव डाला जाता है।
  • दुष्क्रिय अंग-विक्षेप :- इसमें दबाव डालकर धीरे-धीरे मालिश करनी होती है। इससे शरीर के रोगों को दूर करने में विशेष सहायता मिलती है तथा गठिया (जोड़ों का दर्द), अधरंग (शरीर के आधे भाग में लकवा आना) और दर्द आदि बीमारियों में भी इस क्रिया का लाभ मिलता है।

वर्णन-

डॉक्टर मज्गर के शिष्यों प्रोफेसर मोनसन जिल, बेरहम तथा हेलडे आदि ने भी मालिश की नई-नई तकनीके निकालीं और उनसे अनेक प्रकार के रोगियों को रोग से मुक्त किया। इसके बाद हर तरफ मालिश को अपनाया जाने लगा।

सन् 1877 में अमरीकी डॉक्टर वेयर मिचेल ने भी मालिश को एक लाभदायक पद्धति साबित करने में खासा योगदान दिया था। उन्होने `न्युरस्थिनियां´ के रोगियों को मालिश से ठीक करके इसकी उपयोगिता सिद्ध की। उसके बाद मालिश का चिकित्सा के रूप में प्रयोग किया जाने लगा तथा सभी देशों के प्रसिद्ध डॉक्टरों तथा सर्जनों ने इसे अपनाना शुरू कर दिया।

इसके अलावा मालिश के बारे में अनेक विदेशी डॉक्टर हुए, जिन्होंने मालिश के बारे में अनेक साहित्य लिखे और मालिश की उपयोगिता को समझाया। एक प्रसिद्ध पश्चिमी लेखक `मैकन्जी´ ने अपनी लोकिप्रय किताब शिक्षा और औषधियों के प्रयोग´ में मालिश के गुणों की विस्तृत रूप से व्याख्या की। मैकन्जी का कहना था की स्नायु-संस्थान के लिए मालिश सबसे उपयोगी कसरत है, जिससे शरीर में होने वाले चार प्रधान कार्य होते हैं जैसे (रक्त-संचालन (खून का उचित बहाव), श्वास-क्रिया (सांस लेना), पाचन और मल को त्यागने में सहायक होना।

म्युनिक विश्वविद्यालय के प्लास्टिक सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉक्टर केलर ने मालिश और सर्जरी को सगी बहनें बताया है। एक बार मालिश के बारे में समझाते हुए केलर ने कहा कि जिस प्रकार सर्जरी द्वारा हम शरीर के अन्दर के गंदे भाग को काटकर बाहर फेंक देते हैं, उसी प्रकार मालिश भी शरीर के विकारों को रक्त के द्वारा फेंक देती है। सामान्य शब्दों में कहने से तात्पर्य यह है कि मालिश से स्वास्थ्य और सौन्दर्य दोनों में ही काफी बढोत्तरी होती है। डॉक्टर केलर ने खुद भी मालिश के कई प्रयोगों द्वारा अनेक बदसूरत महिलाओं को सुन्दरता प्राप्त करते हुए देखा है।

गर्म-ठंडी मसाज

परिचय-

किसी भी व्यक्ति के शरीर पर गर्म-ठंडी मालिश करने से पहले उसके शरीर को गर्म कर लिया जाता है। इसके बाद शरीर को ठंडा करके मालिश की जाती है। यह मालिश उन रोगियों के लिए विशेष लाभदायक है, जो नाड़ी की कमजोरी के रोग से पीड़ित हों या जिनकी नस-नाड़ियां बहुत कमजोर हो गई हों, जिस कारण वे सर्दी-गर्मी सहन न कर सकते हों। ऐसे रोगियों के लिए यह मालिश काफी लाभदायक होती है। जुड़े हुए जोड़ों, गठिया, वात रोगों तथा अधरंग आदि रोगों में भी यह मालिश विशेष लाभकारी होती हैं।

यदि आप किसी रोगी की यह मालिश करने जा रहे हैं, तो सबसे पहले रोगी के शरीर को गर्म पानी की बोतल से सेंक कर गर्म कर लें। फिर इसके बाद ठंडी मालिश आरम्भ करें। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि ठंडी-गर्म मालिश में ठंडी मालिश की तरह जोर से घर्षण नहीं दिया जाता, बल्कि ये घर्षण बहुत धीरे-धीरे देने चाहिए। इसमें बाकी सभी नियम ठंडी मालिश से मिलते-जुलते हैं। रोगी को सूखे तौलिए से अच्छी तरह रगड़कर व अच्छी तरह गर्म करके भी ठंडी मालिश दी जाती है, परन्तु इस क्रिया का प्रयोग किसी कमजोर रोगी पर कभी भी नहीं करना चाहिए। उनके अंगों को गर्म बोतल की सेंक देकर ही उनकी ठंडी मालिश करनी चाहिए। गठिया तथा जुड़े हुए जोड़ों वाले रोगियों के शरीर पर हाथ चलाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि आपके घर्षण से उन्हें पीड़ा का एहसास न होने पाए, इसलिए ठंडी मालिश को काफी सावधानी से करना चाहिए।

स्वस्थ व्यक्ति भी घर बैठे-बैठे इस मालिश का लाभ उठा सकते हैं, जैसे कि हर व्यक्ति सुबह स्नान करता है तो स्नान करते समय वह अपनी मालिश थोड़े समय में ही कर सकता है। सुबह स्नान करने से पहले अपने शरीर को हाथों से या किसी सूखे तौलिए से घर्षण देकर गर्म कर लें। घर्षण मात्र 5-7 मिनट तक ही दें, उसके बाद ठंडे पानी से स्नान कर लें। ठंडे पानी से भी अपने शरीर को रगड़कर मल लें। इस प्रकार की मालिश और स्नान से शरीर के रोमकूप खुल जाते हैं। शरीर का मैल धुल जाता है तथा चर्मरोग से सम्बंधी रोग दूर हो जाते हैं। त्वचा में शुद्ध खून का संचार तेजी से होता है, जिससे किसी तरह के चर्मरोग नहीं हो सकते। यह भी एक प्रकार की गर्म-ठंडी मालिश करने का ढंग है।

तेल मालिश-

तेल मालिश एक ऐसा उपचार है, जिसमें पूरे शरीर पर तेल मलकर सिलसिलेवार ढंग से गूंथा जाता है। मरीज को आराम की अवस्था में इस तेल मालिश के लिए विशेष रूप से बनाई गई एक गद्देदार मेज पर लिटाया जाता है। मालिश करने का यह काम हाथों से किया जाता है। मालिश शरीर के उस भाग में की जाती है, जिसका इलाज किया जाना होता है। आधे घंटे तक शरीर को थपका जाता है, रगड़ा जाता है, एक प्रकार से गूंथा जाता है, हल्के-हल्के दबाया जाता है तथा हिलाया-डुलाया जाता है।

ये क्रियाएं खून के बहने की दिशा से की जाती है। मालिश की शुरुआत शरीर में दाहिनी ओर दाहिने पैर के साथ होती है और अन्त में सिर और गर्दन की बारी आती है।

असली मालिश तो असल में तेल से ही की जा सकती है। तेल की सहायता से हम अपना हाथ पूरे शरीर पर आसानी से चला सकते हैं। तेल मालिश मांसपेशियों को ढीला करती है, त्वचा को सीधी खुराक पहुंचाती है तथा शरीर में लचक पैदी करती है। रोगों में अधिकतर तेल की मालिश ही करनी चाहिए। वात रोगों, अधरंग (आधे शरीर में लकवा होना), पोलियो, चोट, हड्डी टूटने आदि रोगों में तेल की मालिश काफी लाभकारी होती है।

ठंडी मालिश

ठंडी मालिश तेल से की जाती है। तेल की मालिश से कहने का अभिप्राय यह है कि हम खून को दिल की तरफ ले जाएं, इसलिए यह मालिश नीचे से ऊपर की ओर करते हुए चलते हैं और नसों को तेज करते हैं, परन्तु ठीक इसके विपरीत ठंडी मालिश में हमें धमनियों को तेज करना होता है और उन्हें चलाना होता है। इसलिए यह नीचे से ऊपर की ओर की जाती है। तेल मालिश दिल से नीचे की तरफ की जाती है। कहने का अभिप्राय हैं कि शरीर का यह नियम है कि शरीर के जिस अंग को ठंडा कर दिया जाएगा, रक्त वहां तेजी से भागकर आएगा तथा ठंडे अंग को गर्म करेगा।

उदाहरण के लिए आपने सुना या देखा ही होगा कि बुखार यानी ज्वर से पीड़ित रोगी के माथे पर ठंडे पानी की पटि्टयां रखी जाती हैं तथा पेट पर भी ठंडी पटि्टयां रखी जाती है तो वह गर्म हो जाती है क्योंकि जब वे पटि्टयां अंग को ठंडा करती हैं, तो रक्त उन अंगों को गर्म कर देता है, जिससे पटि्टयां भी गर्म हो जाती है। यदि हम गीले कपड़े को अपने किसी अंग से लगाकर रखते हैं, तो वह गीला कपड़ा गर्म हो जाता है। इसका भी कारण यही है कि जब अंग ठंडा हो जाता है तो धमनियों का खून वहां तेज हो जाता है और खून उस अंग को अधिक गर्मी देकर जल्दी गर्म कर देता है। इसलिए ठंडी मालिश हमेशा धमनियों को तेज करती है। जब शुद्ध रक्त एक स्थान पर जाएगा तो उस अंग को शक्ति मिलेगी, उस अंग में छिपे विकार को वहां से हटना पड़ेगा। इसी को ठंडी मालिश कहते हैं।

तेल मलना :-

इस क्रिया में तेल को रोग वाले अंग पर लगाकर धीरे-धीरे नीचे से ऊपर की ओर दबाव डालकर मलना होता है। तेल सभी अंगों पर लगाना चाहिए, परन्तु दबाव केवल मांसपेशियों पर ही देना चाहिए, हडि्डयों पर नहीं।

लाभकारी-

तेल मलने से शरीर में समा जाता है, त्वचा नर्म होती है, रक्त-संचार में वृद्वि होती है तथा मांसपेशियों शिथिल होती है। इससे मालिश के आधुनिक तरीकों को अपनाने के लिए आपका शरीर तैयार हो जाता है।

मर्दन करना, टांगों की मालिश

परिचय-

मालिश करना एक प्रकार की क्रिया होती है, जो विशेषज्ञों की देखरेख में ही करनी चाहिए परन्तु यहां पर हम `स्वयं अपनी मालिश के ढंग´ या तरीको को समझा रहे हैं जैसे हाथों, पैरो और टांगों आदि की मालिश जो इस प्रकार से हैं।

  • सबसे पहले टांगों पर तेल मलने के बाद जमीन पर बैठ जाएं। अब अपना दायां हाथ दोनों टांगों के बीच ले जाकर बाएं पांव के टखने पर गोलाई में जमाएं। अब अपनी दाई टांग का दबाव दाएं हाथ की कोहनी पर तथा बाएं हाथ का दबाव बाएं घुटने पर डालें। इससे टांग एक अवस्था में स्थिर रहेगी। अब अपना दायां हाथ ऊपर की तरफ घुटनों तक धीरे-धीरे मालिश करते हुए ले जाएं। आपका हाथ बाई टांग के स्थान पर रहने दें। बाजू पर दाई टांग का दबाव होने के कारण हाथ खुद ही फिसलता जाएगा। यह क्रिया 4-5 बार करें।
  • अब अपने बाएं हाथ को बाईं टांग के घुटने से हटा लें तथा उसी टांग के टखने पर जमाएं। अब दबाव डालकर हाथ से मालिश करते हुए घुटने तक ले जाएं। इस समय आप बाई टांग के दूसरे भाग की मालिश कर रहे हैं, इस क्रिया को भी 2-3 बार करें।
  • हर क्रिया के बाद अपने दोनों हाथ ढीले रखकर पूरी टांग पर ऊपर-नीचे घर्षण करें। इससे आपके हाथ और टांगों में ढीलापन आ जाता हैं।
  • अब पहले वाली स्थिति में आ जाएं। फिर अपने हाथों को एक दूसरे के ऊपर रखकर बाएं घुटने के पास जांघ पर रखें। उसके बाद दबाव डालते हुए अपने हाथों से जांघों पर मालिश करते हुए नीचे की तरफ ले जाएं। अपने हाथों को थोड़ा दाएं-बाएं करके भी यह क्रिया करें। ऐसा केवल आप 3 से 4 बार कर सकते हैं।
  • अब बाई टांग को सामने की तरफ ऊंची करके फैलाएं। उसके बाद अपने दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में फंसाकर हाथ बांध लें तथा अब अपने हाथों को टांग के नीचे से पांव के तलवे पर रखें। हाथ इस प्रकार गोल होने चाहिए कि वे टांग के नीचे से पांव के तलवे पर बैठ जाएं। अब जोर लगाते हुए धीरे-धीरे हाथों को जांघों की तरफ लाएं। हाथों को पीछे खींचते समय आपको थोड़ा लेटना भी पड़ेगा, तथा आप अच्छी तरह जोर लगा सकेंगें तथा आपका हाथ भी टांगों पर ठीक प्रकार चल सकेगा। इस क्रिया को 3 से 4 बार कर सकते हैं।
  • अब फिर से पहले की तरह बैठ जाएं। इस क्रिया में आपको अपना हाथ घुटने के पास जांघों पर नहीं रखना है बल्कि अपनी बाईं बाजू को जांघों के नीचे से निकालकर अन्दर-बाहर रखें। दूसरी बाजू भी इसी प्रकार निकालें। अब अपने दोनों बाजुओं को अन्दर-बाहर करते हुए जांघों के निचले भाग की मालिश करें।
  • इस क्रिया में भी पहले की ही तरह बैठे रहें। फिर अपने एक हाथ को चूड़ी का आकार देकर टखने को पकड़ लें। उसके बाद हाथ की चूड़ी को दबाकर घुमाते हुए घुटनों तक लाएं। इस क्रिया को `मरोड़ना क्रिया´ के नाम से भी जानते हैं। अब घुटनों पर चारों तरफ से मालिश करें फिर दोबारा अपने हाथ की चूड़ी बनाकर दबाव के साथ पूरी जांघ पर चलाएं। यह क्रिया भी 4-5 बार करें। इस बात का अवश्य ध्यान रखें कि पिण्डलियों के ऊपर की हड्डी पर दबाव नहीं पड़ना चाहिए बल्कि केवल पिंडली और आस-पास की मांसपेशियों पर ही दबाव पड़ना चाहिए। एक स्थान पर चूड़ी चलाते समय उसी स्थान पर 2 से 3 बार अन्दर-बाहर चूड़ी घुमाएं और उसके बाद आगे बढ़ें।
  • पूरी टांग पर एक ही तरह से हाथ चलाना चाहिए।
  • जब टांगों की मालिश पूरी हो जाए, तो आखिर में आकृति 3 की भांति खड़ी ठोक, मुक्का मारना और कंपन आदि क्रियाओं को करना चाहिए।

इस प्रकार से आपकी एक टांग की मालिश पूरी हो जाएगी। इसके बाद आप दूसरी टांग की मालिश भी इसी तरह से कर सकते हैं।

शरीर के अंगों की मालिश

परिचय-

शरीर की मालिश कई विधियों से की जाती है। जिस तरह पूरे शरीर की मालिश के लियें कुछ नियम व विधियां बनाई गई है उसी तरह शरीर के कुछ अंगों की मालिश के लियें भी नियम व विधियां बनाई गई है। इन क्रियाओं का लाभ मालिश करने के तरीके व मालिश करने वाले चिकित्सक के ऊपर पर निर्भर करता है कि वह किस प्रकार से मालिश करता है।

सिर की मालिश के लिए :-

  1. सिर की मालिश हमेशा हल्के रूप में ही करनी चाहिए।
  2. मालिश करने की क्रियाएं थोड़ी-थोड़ी देर के बाद बदलते रहनी चाहिए।
  3. सिर की मालिश कुछ इस प्रकार करें कि बालों की जड़ों को शक्ति मिल सके। मालिश करते समय तेल बालों की जड़ों तक जाना चाहिए न कि सिर्फ ऊपर-ऊपर ही रह जाए।
  4. मालिश का अधिक लाभ लेने के लिए सिर की मालिश रात को करनी चाहिए क्योंकि रात की मालिश से दिमाग पर चढ़ी दिनभर की थकावट दूर हो जाती है और सिर हल्का हो जाता है। मालिश सोने से ठीक पहले करनी चाहिए ताकि मालिश के बाद नींद अच्छी आ सके।
  5. यदि प्रतिदिन सिर की मालिश करवाना सम्भव न हो तो कम-से-कम सप्ताह में 1 बार तो अवश्य करनी चाहिए। इससे बुद्धि का अच्छा विकास होता है तथा जुकाम और सिर के दर्द में आराम मिलता है। और बाल भी जल्दी सफेद नहीं होते।

मालिश करने की विधियां :-

  • हाथों की अंगुलियों की कंघी के रूप में बनाकर पूरे सिर के बालों की जड़ों तक मालिश करें।
  • अपने हाथों को दाईं-बाईं तरफ खोलकर अन्दर-बाहर और आगे-पीछे पूरे सिर की मालिश करें।
  • मालिश करते समय सिर को थपथपाना चाहिए।
  • दोनों हाथों की सहायता से सिर के पिछले भाग की ऊपर-नीचे कई बार मालिश करनी चाहिए।
  • दोनों हाथों को चूड़ी का आकार देकर और माथे के ऊपर सिर के भाग को घुमाकर मरोड़ें।
  • दोनों हाथों को इस प्रकार जोड़ें कि आपकी सभी अंगुलियां खुली हों। अब हाथों से सिर को ठोकें और दोनों हाथों से सिर को चारों तरफ से दबाएं।

आंखों की मालिश-

आंखों के भीतरी और ऊपरी कोनों से आंखों के चारों ओर बाहर की ओर हल्की मसाज करें। हाथों की तीसरी उंगली का प्रयोग करते हुए नाक के दोनों किनारों और कनपटी पर हल्का दबाव देते हुए मसाज करें। आंखों के आस-पास की त्वचा बहुत कोमल होती है इसलिए ध्यान रखें कि त्वचा को खिंचने न दे। नाक से शुरू करके ऊपर की ओर भौंहों पर चुटकी काटते हुए मसाज करें। तर्जनी और अंगूठे की सहायता से भौंहों पर हल्की ऐंठन दें। 5 बार ऐसा करने से आंखों की थकान दूर होती है। भौंहों पर सीजर मसाज से भी आंखों की थकान दूर होती है।

चेहरे की मालिश :-

चेहरे की मालिश की शुरूआत गालों से करनी चाहिए। इससे जबड़े को विश्राम मिलता है तथा गाल सुडौल होते हैं। अपने दोनों अंगूठों को ठोढ़ी के बीच में रखकर बाहर की ओर जबड़े के अन्त तक मसलते हुए ले जाएं। अंगुलियों के पोरों को मिलाकर गालों को हल्के से कानों की ओर दबाएं। दोनों हाथों को क्रमबद्ध तरीके से मुंह के किनारों से कान की ओर धीरे-धीरे सरकाने का प्रयास करें।

आंखों के नीचे वाले हिस्से की मालिश नहीं करनी चाहिए। यह बेहद नाजुक स्थान होता है। जिसकी मांसपेशियां कमजोर होती है। भौहों के बीच से लेकर आंखों के चारों ओर गोलाई की दिशा में नाक के ऊपरी सिरे तक मालिश करें। माथे की सलवटें (भृकुटि) को दो पद्धतियों द्वारा तनाव से छुटकारा दिलाया जा सकता है। भौहों के बीच के भाग से दोनों तरफ अंगुलियों की पोरों को सरकाते हुए दोनों कानों के ऊपरी भाग तक लाएं और धीरे-धीरे अंगुलियों को ऊपर के भाग में बढ़ाते हुए माथे पर यही प्रक्रिया दोहराएं और कनपटी तक ले जाएं। इसके बाद वर्टिकल यानी खड़ी दिशा में मालिश करें। इसमें अंगुलियों को भौहों के बीच से बालों की तरफ ऊपर ले जाएं। सलवटें (भृकुटि) लाइन को कभी नीचे की दिशा में न खींचे। हमेशा ऊपर की ओर या तिरछी दिशा में मालिश करें। कनपटी का तनाव दूर करने के लिए गोलाई में हल्के-हल्के अंगुलियां चलाएं। धीरे-धीरे दबाव बढ़ाएं। इसके बाद में 10 से 15 मिनट तक आराम करने से लाभ होगा।

मुंह की मालिश के लिए :-

मुंह की मालिश यदि सिर की मालिश के साथ ही की जाए तो बहुत अच्छा रहता है। सबसे पहले थोड़ा-सा तेल हाथों पर चुपड़कर पूरे चेहरे पर मलें। उसके बाद माथे पर हाथ से सिर की तरफ तेल मलें। गर्दन ऊपर करके ठोढ़ी के नीचे भी तेल मलें। अंगुलियों तथा अंगूठे की सहायता से आंखों के चारों तरफ हल्का-हल्का घर्षण दें। नाक के दोनों तरफ अंगुलियों से मालिश करते हुए हाथ कानों तक ले जाएं। गालों पर हाथ गोलाकार नीचे की तरफ चलाएं।

आंखों को सहलाएं, कंपन दें तथा गालों पर भी गोलाई से घर्षण देकर कंपन दें। कानों में 2-2 बूंद तेल डालें तथा उनके ऊपर हाथ से कंपन दें। नाक में भी दोनों तरफ 2-2 बूंद तेल डालें तथा नाक की बाहरी ओर मालिश करें तथा जोर से सांस लें। यह क्रिया आंखों की रोशनी तथा जुकाम के लिए काफी लाभकारी होती है।

वैसे सरसों के तेल को अंगुलियों की मदद से गुदा में लगाना बहुत लाभदायक है। अण्डकोष और गुदा के बीच पौरूष ग्रंथि (प्रोस्टेट ग्लैण्ड) पर भी तेल की मालिश करनी चाहिए। अण्डकोष के आस-पास के भाग पर मालिश करने से पेशाब सम्बंधी रोगों से बचा जा सकता है। गुदा में तेल लगाने की क्रिया को `गणेश क्रिया´ कहा जाता है। इससे कब्ज रोग नहीं होता और बवासीर नामक बीमारी से भी बचा जा सकता है।

मुख की मालिश करते आंखों पर अधिक दबाव नहीं देना चाहिए, क्योंकि आंखे कोमल अंग होती हैं। यदि भोजन के बाद अपनी हथेलियों से आंखों को सहलाया जाए, आंखों को चारों तरफ से मसला जाए तथा पूरे चेहरे पर हाथ फेरा जाए तो इन क्रियाओं द्वारा बहुत लाभ उठाया जा सकता है। इससे आंखों की रोशनी में बढोत्तरी होती है। चेहरे पर भी यदि हम स्नान से पहले प्रतिदिन सूखे हाथों से मालिश करें तो भी लाभ उठा सकते हैं, क्योंकि इससे चेहरे पर मुहांसे नहीं निकलते और चेहरे की सुन्दरता बनी रहती है।

महिलाओं को अपनी सुन्दरता बनाए रखने के लिए मालिश का सहारा लेना चाहिए।

हाथों की मालिश के लिए :

हाथों की मालिश करने के लिए सबसे पहले हाथों पर तेल लगाकर दोनों हथेलियों को आपस में रगडे़। हाथ के ऊपरी भाग को दूसरे हाथ के अंगूठे से मसलें। गांठें घुमाएं, जोड़ों को चलाएं तथा दूसरे हाथ की मदद से हाथ की प्रत्येक अंगुली को पकड़कर हल्का झटका दें। अंगुलियों के ऊपर की मांसपेशियों को घर्षण दें। कलाई को दूसरे हाथ की मदद से गोलाकार मसलें और घुमा दें।

बाजू की मालिश :-

  • सबसे पहले अपनी बाजुओं पर अच्छी तरह से तेल मलकर नीचे दिखाई गई आकृति की तरह बैठकर अपना आधा हाथ अन्दर से दूसरे पांव के नीचे दबा लें। अब दूसरे हाथ को उसी हाथ के पास गोलाई में टिका लें और टांग का दबाव डालते हुए हाथ से मालिश करते हुए नीचे से ऊपर की ओर चलें। ध्यान रहे कि दूसरी टांग को भी बाजू को पूरा सहारा मिलना चाहिए तभी दबाव अच्छा पड़ेगा।
  • अपनी अंगुलियों और हथेली की अच्छी तरह मालिश करके घुमाएं। फिर कोहनी से बाजू को कई बार घुमाएं। इसी तरह कंधे को भी इसी तरह घुमाएं।
  • अब अपना वह हाथ जो आपने पांव के नीचे दबा रखा है निकाल लें तथा हाथ उल्टा करके फिर वहीं दबा लें। इससे आपका बाजू उल्टा हो जाएगा। जिस प्रकार आपने बाजू के दूसरे भाग पर मालिश की है, उसी प्रकार इस भाग पर भी मालिश करें। इस भाग पर भी वही क्रिया 3 से 4 बार ही करें।
  • अपने हाथ को टांग से बाहर निकाल लें और नीचे दी गई आकृति की तरह एक हाथ की चूड़ी बनाकर दूसरी बाजू पर घुमाते हुए चलें। जिस बाजू की आप मालिश कर रहे हैं, चूडी के साथ-साथ उसे भी घुमाते रहें।
  • टांगों की भांति बाजू को भी झकझोरें। ताल से हाथ चलाना, खड़ी ठोक देना, मुक्का मारना और कंपन देना आदि क्रियाओं का प्रयोग करें। इस तरह आपकी एक बाजू की मालिश हो जाएगी। इसी प्रकार दूसरी बाजू की भी मालिश करें।

गर्दन की मालिश :-

हर व्यक्ति के शरीर के कंधे और गर्दन पर सबसे अधिक तनाव रहता है क्योंकि गर्दन पर सिर का भार रहता है। इसके अलावा कंधे अधिक झुकाकर बैठने से भी गर्दन के दोनों ओर की मांसपेशियां तन जाती हैं। गर्दन की मालिश करने के लिए रोगी को पेट के बल लिटाकर दोनों कंधों पर `नीडिंग´ क्रिया करनी चाहिए। यह `नीडिंग´ क्रिया गर्दन से खोपड़ी के नीचे तक करने से लाभ होता है।

गर्दन और चेहरे की मालिश के लिए :-

  • गर्दन पर तेल लगाकर दोनों हाथों से गर्दन को पकड़ें और दबाव देकर चारों तरफ हाथ घुमाते हुए मालिश करें।
  • अपना दायां हाथ बाईं ओर से घुमाकर गर्दन के पीछे के भाग से थोड़ा ऊपर रखें तथा वहां से दबाव डालते हुए हाथों को कंठ तक लाएं। अच्छा हो, यदि हाथ के साथ ही गर्दन को भी घुमाते जाएं, इससे दबाव ठीक बनेगा व हाथ आसानी से चलेगा। ठीक इसी तरह बाएं हाथ से गर्दन के पिछले भाग से कंठ तक मालिश करें।
  • हाथ को ठोड़ी के नीचे रखें तथा ऊपर से नीचे की तरफ गर्दन और गले पर मालिश करें। यह क्रिया 4 से 5 बार होनी चाहिए।
  • अपने दोनों हाथों की सहायता से पूरे चेहरे को ढक लें। फिर चेहरे को हाथों से धीरे-धीरे मसलते हुए मालिश करें। ध्यान रखें कि इस क्रिया में आपकी आंखों पर किसी प्रकार का कोई दबाव न पड़ने पाए। आंखों को हथेली की मदद से हल्का-हल्का मसल लें। अंगुलियों से आंखों के चारों तरफ मालिश करें।

गर्दन और कंधों की मालिश-

मालिश की शुरूआत गर्दन और कंधों से करें, जहां ज्यादा तनाव उत्पन्न होता है। दाहिने हाथ को छाती पर बीच में रखकर ऊपर तक मसलते हुए गर्दन और कंधे के बाई तरफ ले जाएं। इसी प्रकार बाएं हाथ को छाती पर रखकर दाईं ओर ले जाएं। इस प्रक्रिया को बारी-बारी से दोहराएं। इसी तरह दोनों हाथों से गर्दन के पीछे का तनाव दूर करें। अपने दोनों हाथों को कटोरा आकार बनाकर एक हाथ गर्दन के निचले हिस्से पर तथा दूसरा जबड़े के नीचे रखें। फिर दोनों हाथों को हल्के दबाव के साथ जबड़े के पीछे ले जाएं। इसी प्रकार हाथ नबदलकर प्रक्रिया दोहराएं तथा हाथों को गर्दन के चारों ओर घुमाएं। गर्दन के अगले हिस्से पर अंगुलियों के नीचे से ऊपर जबड़े तक मालिश करें।

छाती की मालिश :-

मनुष्य की छाती में 2 अंग काफी महत्त्वपूर्ण होते है। फेफड़े और हृदय। जिगर और आमाशय छाती के निचले भाग में होते हैं। जिगर दाईं तरफ और आमाशय बाईं तरफ, जो आधा पसलियों के नीचे और आधा पेट में होता है।

सबसे पहले तेल लगाकर रोगी की छाती की मालिश करें। फिर दोनों तरफ की बगलों की तरफ की मांसपेशियों को पकड़कर मसलें। उसके बाद बारी-बारी से प्रत्येक को रगड़ें। स्तनों और हृदय पर गोलाकार मालिश करें। उसके बाद दोनों हाथों को छाती के बीच रखकर बगल की तरफ से हृदय की ओर मालिश करें। और छाती को थपथपाएं। कटोरी थपकी क्रिया का प्रयोग करें। पूरी छाती पर अच्छा घर्षण दें, हल्की-हल्की मुक्कियां मारें और कंपन दें।

पेट की मालिश करने के लिए :-

पेट की मालिश करने के लिए सबसे पहले रोगी को अपना पेट बिल्कुल ढीला छोड़ देना चाहिए। जिस समय पेट की मालिश की जा रही हो, उस समय पेट एकदम खाली होना चाहिए, यानी रोगी ने कुछ खाया-पीया नहीं होना चाहिए। यदि कुछ खाया-पिया भी हो, तो वह कम-से-कम 4 से 5 घण्टे पहले खाया हो।

यदि पेट भरा हो, तो मालिश बिल्कुल भी नहीं करानी चाहिए। इसके अलावा मालिश करने वाले को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि यदि रोगी के पेट पर सूजन या घाव हो तो ऐसी अवस्था में पेट की मालिश बिल्कुल नहीं करनी चाहिए क्योंकि इससे रोगी को लाभ के स्थान पर हानि ही पहुंचेगी। पेट की मालिश बहुत महत्त्वपूर्ण होती है क्योंकि हमारा पेट पोषण-संस्थान होता है तथा इसमें यकृत (जिगर), प्लीहा (तिल्ली), आमाशय, पक्वाशय, क्लोम ग्रंथि, छोटी-बड़ी आंतें आदि होती हैं इसलिए पेट की मालिश को बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

मालिश के शुरू करने से पहले पेट पर तेल लगाकर मालिश करनी चाहिए। पेट की बड़ी आंत से मालिश आरम्भ करके हाथ को धीरे-धीरे दबाते हुए जिगर तक ले जाना चाहिए। फिर हाथ को बाईं तरफ मोड़कर आमाशय के पास ले जाएं, उसके बाद हाथ को प्लीहा पर दबाते हुए नीचे की तरफ लाएं, फिर वहां से दाईं तरफ चलें, इसके बाद हाथ को दबाव के साथ ऊपर ले जाकर बीच में लाएं तथा नीचे की तरफ पेड़ू के निचले भाग पर दबाव समाप्त करें। पेट के जिस-जिस भाग पर हमारा हाथ चलता है, बड़ी आंत भी इसी प्रकार चलती है जो दाईं तरफ पेट के निचले कोने से होकर जिगर के नीचे से होती हुई आमाशय की तरफ बढ़ती है। फिर वहां से दाईं तरफ को नीचे जाती है, फिर थोड़ा दाएं जाकर ऊपर को बढ़ती है, उसके बाद दाएं से नीचे मुड़कर सीधी गुदा से जा मिलती है।

पहले 5 से 6 बार मालिश का हाथ पीछे बताए अनुसार चलाना चाहिए। एक बार इस क्रिया से हाथ चलाने के बाद पेट पर थोड़ा घर्षण दें तथा झकझोरें, फिर दोबारा हाथ चलाएं। पेट की मांसपेशियों को मसलें और बेलन क्रिया का प्रयोग करें।

इस क्रिया के बाद अपने हाथ को पेट की नाभि पर रखें तथा वहीं से हाथ दाएं से बाएं चक्राकार घुमाएं। धीरे-धीरे उस चक्र को घुमाते हुए बड़ा करते जाएं तथा बड़ी आंत तक आ जाएं। बड़ी आंत पर भी यह चक्र चलाएं। यह क्रिया 2 से 3 बार करें। उसके बाद पेट को रगड़ें, इससे आपके हाथ के साथ रोगी का पेट भी ढीला हो जाता है।

अपने दाहिने हाथ की पांचों उंगुलियों को आपस मे मिलाकर नाभि पर रखें तथा रोगी की स्थिति के अनुसार कंपन देते हुए अपनी उंगुलियों को दबाव देकर नीचे पेट के अन्दर ले जाएं, फिर ढीला छोड़कर हल्के हाथ से दाएं से बाएं और चलाएं। उसके बाद दोबारा अपनी उंगुलियों को आपस में मिलाकर हाथ पसलियों के बीच में खाली जगह पर रखें। फिर दबाव देते हुए अपने हाथ को वहां से सीधे नीचे की तरफ ले जाएं और पेड़ू के निचले भाग पर आकर दबाव समाप्त करें।

यदि आप जरूरत महसूस करें तो अपने दूसरे हाथ का दबाव भी उस हाथ पर डाल सकते हैं। इस क्रिया का प्रयोग 2 से 3 बार ही करना चाहिए। हाथों का दबाव उतना ही रखें, जितना कि रोगी सहजता से सहन कर सके। बाद में पेट पर हल्की थपकी देकर झकझोर दें। बेलना, थपथपाना, दलना, और कंपन देना आदि क्रियाएं बारी-बारी से करते रहें।

पेट और छाती की मालिश के लिए :-

पेट और छाती की मालिश करने के लिए मालिश करने वाले को निम्न प्रकार की बातों का विशेष ध्यान रखना पड़ता है जैसे-

पहला :- सबसे पहले पेट और छाती पर अच्छी तरह तेल लगा लें। उसके बाद नीचे दिखाई आकृति की भांति अपने दोनों हाथों को बड़ी आंत के ऊपर दाएं-बाएं रखकर दाएं से बाएं घुमाएं। पहले दाईं ओर का हाथ थोड़ा ऊपर ले जाएं, फिर बाई ओर का हाथ ऊपर ले जाएं। फिर वहां से वापस नीचे ले जाएं। ऐसा 4 से 5 बार करें। हाथों को धीरे-धीरे और दबाव के साथ चलाएं। पेट की मालिश उसी प्रकार करें।

दूसरा :- अपने हाथों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर पसलियों के बीच पेट के ऊपर से दबाव के साथ नीचे की तरफ लाएं। इस क्रिया में आप अपने हाथों को सीधे या लम्बे आकार में दोनों तरह चला सकते हैं।

तीसरा :- अपने दोनों हाथों की अंगुलियों को नाभि यानी पेट के बीच के केन्द्र पर रखें तथा दाएं से बाएं चक्राकार चलाएं। फिर धीरे-धीरे इस चक्र को बड़ा करते चले जाएं।

चौथा :- अपने पेट पर थोड़ा दबाव डालें तथा नीचे से ऊपर, दाएं से बाएं धीरे-धीरे मसलें, झकझोरे तथा बेलन क्रिया और कंपन क्रिया करें।

पांचवा :- अपना दायां हाथ बाएं कंधे पर रखकर दबाव के साथ नीचे छाती की ओर लाएं, फिर बायां हाथ दाएं कंधे पर रखकर दबाव के साथ नीचे छाती पर लाएं। यह क्रिया भी कई बार करें।

छठा :- अब नीचे दिखाई गई आकृति की भांति अपने हाथ को छाती पर रखें तथ दबाव डालते हुएं अन्दर की ओर इस प्रकार लाएं कि आपके दोनों हाथ मिल जाएं। हाथों को ऊपर-नीचे करके छाती की मालिश करें और पसलियों पर घर्षण दें। फिर हाथों को अन्दर-बाहर करके पूरी छाती पर मालिश करें। हृदय और स्तनों पर गोलाकार मालिश करें।

पीठ की मालिश :-

कमर के ऊपर के भाग को पीठ के नाम से जाना जाता है। मालिश के द्वारा शरीर की थकावट को कम किया जा सकता है क्योंकि नाड़ी-जाल मेरुदण्ड (रीढ़ की हडि्डयों) से होकर हमारे शरीर में फैलता है, अत: पीठ की मालिश में इन नाड़ियों को शक्ति देकर शरीर की थकान दूर की जा सकती है।

  • पीठ की मालिश करने के लिए सबसे पहले पीठ पर तेल लगाएं तथा फिर मालिश शुरू करें। दलन और ताल से हाथ चलाना आदि क्रियाओं का प्रयोग करे। पीठ के ऊपरी भाग की नीचे की तरफ और नीचे वाले भाग की ऊपर की तरफ मालिश करें। ध्यान रहें कि नीचे से ऊपर की तरफ जो मालिश हो, वो दिल की तरफ होनी चाहिए।
  • बाद में रोगी की पीठ पर सवार हो जाएं तथा अपने दाएं हाथ को सीधा रीढ़ की हड्डी पर रखें। अब अपने दूसरे हाथ को भी पहले हाथ के ऊपर रख लें तथा रोगी की शारीरिक स्थिति के अनुसार अपने शरीर का दबाव डालकर हाथों को सीधा ऊपर की तरफ गर्दन तक ले जाएं। रोगी के लेटने की अवस्था में उसका माथा जमीन पर टिका होना चाहिए तथा मुंह नीचे की ओर और गर्दन सीधी होनी चाहिए। ऊपर बताई गई क्रिया को 2 से 3 बार किया जाना चाहिए। उसके बाद पीठ पर घर्षण दें तथा उसे झकझोरें तथा अपने हाथ और पीठ को ढीला छोड़ दें।
  • दूसरी क्रिया :- अपने दोनों हाथों को पीठ के नीचे की तरफ रीढ़ से मिलाकर दाएं-बाएं रखें। दोनों हाथों के अंगूठे इस प्रकार रहने चाहिए कि वे रीढ़ को मसलते हुए चल सकें। अंगुलियों तथा हथेलियों का दबाव एक साथ रहना चाहिए। अब अपने हाथों को दबाव के साथ ऊपर की तरफ फिसलाते हुए ले जाएं। हाथ कंधों तक ले जाकर, कंधों की मांसपेशियों को पकड़कर मसल लें। इस प्रकार मसलने पर रोगी को दर्द महसूस होता है। इस क्रिया में सिर सीधा रखने की आवश्यकता नहीं होती बल्कि रोगी चाहे तो अपना सिर एक तरफ रख सकता है। इस मालिश में रोगी के बाजू मुड़े हुए, बगल से थोड़ा हटकर, जमीन पर टिके होने चाहिए और हथेलियां रोगी के मुंह के पास नीचे की तरफ रहनी चाहिए। इस प्रकार लेटने से पीठ की मांसपेशियों पर तनाव नहीं पड़ता है।
  • तीसरी क्रिया :- अपने दोनों हाथों को रीढ़ के दाएं-बाएं इस प्रकार रखें कि आपके दोनों अंगूठे रीढ़ पर मालिश करते हुए चल सकें तथा हथेलियां बगल की तरफ से पूरी पीठ की मालिश करते हुई कंधों तक जा सकें। हाथों को इस प्रकार रखने के बाद अपने शरीर का दबाव देते हुए ऊपर की तरफ मालिश करें। कंधों तक हाथों को कोहनियों तक ले जाएं। इस क्रिया को भी 3 से 4 बार करना चाहिए। एक बार क्रिया करने के बाद पीठ पर घर्षण करें और शरीर को झकझोरें। अपनी अंगुलियों को भी बार-बार रीढ़ की हड्डी (मेरुदण्ड) पर चलाना चाहिए।
  • चौथी क्रिया :-अपने दोनों हाथ रीढ़ की हड्डी के दाएं-बाएं रखें जिसे कि अंगुलियां नीचे की तरफ रहें तथा हथेलियां रीढ़ के ऊपर एक-दूसरे से मिली हुई हों। हाथों को ऐसा आकार देने के बाद पहले कुल्हों (नितंबो) पर हथेलियों की मदद से दलन-क्रिया का प्रयोग करें। उसके बाद अपने हाथों को शरीर के दबाव से बगल की तरफ फिसलाते हुए चलें। रीढ़ से बगल की तरफ मांसपेशियों को मसलते हुए हाथों को ऊपर की तरफ लेकर चलें।

उसके बाद रोगी की पीठ से उतरकर बाई तरफ पुरानी बताई गई आकृति की तरह बैठ जाएं। इस स्थिति में बैठने पर आपका हाथ पूरी सुगमता के साथ रोगी के सिर से पांव की तरफ चलेगा।

पांचवीं क्रिया :-

इस क्रिया में हाथ को रीढ़ के ऊपर लम्बे आकार में रखा जाता है। इस प्रकार हाथ रखने के बाद अपने शरीर के दबाव से हाथ को फिसलाते हुए ऊपर की तरफ ले जाएं। पेट के ठीक ऊपर एक झटके के साथ डालें, फिर आगे चलें और 4 से 5 इंच ऊपर जाकर फिर झटके के साथ दबाव डालें। ऐसे दबाव से रोगी की सांस तेजी से बाहर निकलेगी। हाथ को उसी प्रकार से आगे बढ़ाते हुए छाती के ऊपर ठीक पीठ पर जाकर दोबारा झटके से दबाव डालें, इससे फेफड़ें सिकुडेंगे तथा सांस बाहर निकलेगी। ऐसा करते हुए अपने हाथ गर्दन तक ले जाएं। नाभिचक्र, फुफ्फुस और पसलियों को इस प्रकार के दबाव से बहुत लाभ पहुंचता है।

अब पीठ की मांसपेशियों को मसलें तथा बेलन क्रिया का प्रयोग करें। खड़ी थपकी का प्रयोग पीठ, नितम्बों (कुल्हों), जांघों और पिण्डलियों पर करें। सभी अंगों पर अंगुलियों से ठोक दें तथा कटोरी थपकी, थपथपाना, मुक्की मारना, कंपन देना आदि क्रियाओं का प्रयोग बारी-बारी से करें।

कमर की मालिश के लिए :-

वैसे तो मानव शरीर में सभी अंगों की अपनी अलग-अलग विशेषताएं होती हैं, परन्तु कमर की योग्यता को नजर अदांज नहीं किया जा सकता क्योंकि उठने, बैठने, झुकने आदि से सम्बंधित सभी क्रियाओं में कमर का उपयोग किया जाता है। इसके लिए कमर लचीली बनी रहनी चाहिए, मगर इसकी ही सबसे अधिक उपेक्षा की जाती है। इसी कारण से 10 में से 8 व्यक्ति कमरदर्द से पीड़ित रहते हैं। उन्हें किसी न किसी प्रकार की कमर में तकलीफ होती रहती है। केवल कमर की सही देखभाल न करने के कारण बाद में यही छोटी-छोटी तकलीफें भंयकर दर्द या बीमारी का रूप धारण कर लेती है, तब उन्हें अपनी कमर के बारे में ध्यान न देने का अर्थ समझ में आता है। कमर से शरीर का तंत्रिकातंत्र (नर्वस सिस्टम) जुड़ा रहता है इसलिए कमर की कमर की मालिश से पूरे शरीर को लाभ पहुंचता है।

पांव की मालिश के लिए :-

सामान्य रूप से तेल की मालिश की शुरूआत पांवों से करनी चाहिए। पहले पांवों की अंगुलियों पर अच्छी तरह तेल लगाएं फिर उन्हें अंगूठे से मसलें, जोड़ों को थोड़ा बहुत हिलाएं, ताकि उनमें हलचल सी हो जाए। पांव को पूरी तरह से ढीला छोड़ दें उसके बाद बारी-बारी से पांवों की 1-1 अंगुली को पकड़कर झटका दें। उसके बाद तलवे पर तेल की मालिश करें, फिर हाथ और अंगूठे की सहायता से पांव से ऊपर तेल मसलें। टखनों को गोलाई से मलें, गांठों को घुमाएं और जोड़ों को कसरत दें तथा उंगुलियों मे हल्की-हल्की ठोक लगाएं।

बिजली से मालिश

इस प्रकार की बिजली की मालिश बिजली के छोटे-बड़ें कई प्रकार के यंत्रों से की जाती है और इसका प्रयोग शरीर के अवयवों पर गहरा प्रभाव डालने के लिए किया जाता है। वैसे ये यंत्र बाजार में उपलब्ध हो जाते हैं, जो कि बहुत महंगे हैं। इन यंत्रों में शरीर के अलग-अलग अंगों की मालिश के लिए अलग-अलग पुर्जे लगे होते हैं। यंत्र में एक पुर्जे को उतारकर दूसरा पुर्जा लगाया जा सकता है। इस मालिश का उद्देश्य भी शरीर में रक्तसंचार तेज करना होता है, जिससे शरीर के अंगों को शक्ति मिल सके।

मालिश करने वाले बिजली के इन यंत्रों को `मसाजर´ या `वाइब्रेटर´ कहा जाता है। इन यंत्रों से मालिश करते समय बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है तथा इनसे मालिश करने के नियम भी अलग-अलग होते हैं। वैसे घर में प्रयोग किए जाने वाले `मसाजर´ बाजर में शीघ्र ही प्राप्त हो जाते हैं।

बिजली के इन यंत्रों में अलग-अलग आकार के 4 से 5 प्रकार के पुर्जे लगे होते हैं, जिनसे शरीर की मालिश की जाती है। एक पुर्जा कंघी की शक्ल का होता है, जिससे सिर की मालिश की जाती है। दूसरा पुर्जा स्पंज की तरह नर्म होता है, जिससे चेहरे की मालिश की जाती है। तीसरा पुर्जा जोड़ों और हडि्डयों पर चलाने के लिए होता है, जिसका आकार `टल्ली´ की तरह होता है। यह अंगों के कोमल और मांसपेशियों पर चलाने के लिए होता है। बिजली की मालिश लाभ तो देती है, साथ ही शरीर पर गहरा प्रभाव भी डालती है, कहने का अभिप्राय है कि जो लाभ हम हाथ की मालिश से प्राप्त कर सकते हैं वह बिजली के इन यंत्रों से नहीं प्राप्त कर सकते क्योंकि हाथ की मालिश द्वारा जो शक्ति तथा शुद्ध विचार हम रोगी को देते हैं वह शक्ति और विचार बिजली के ये निर्जीव यंत्र उसे नहीं दे सकते।