बुधवार, 7 दिसंबर 2011

सुख सम्रद्धि

1‌‌‍॰ यदि परिश्रम के पश्चात् भी कारोबार ठप्प हो, या धन आकर खर्च हो जाता हो तो यह टोटका काम में लें। किसी गुरू पुष्य योग और शुभ चन्द्रमा के दिन प्रात: हरे रंग के कपड़े की छोटी थैली तैयार करें। श्री गणेश के चित्र अथवा मूर्ति के आगे “संकटनाशन गणेश स्तोत्र´´ के 11 पाठ करें। तत्पश्चात् इस थैली में 7 मूंग, 10 ग्राम साबुत धनिया, एक पंचमुखी रूद्राक्ष, एक चांदी का रूपया या 2 सुपारी, 2 हल्दी की गांठ रख कर दाहिने मुख के गणेश जी को शुद्ध घी के मोदक का भोग लगाएं। फिर यह थैली तिजोरी या कैश बॉक्स में रख दें। गरीबों और ब्राह्मणों को दान करते रहे। आर्थिक स्थिति में शीघ्र सुधार आएगा। 1 साल बाद नयी थैली बना कर बदलते रहें।

2॰ किसी के प्रत्येक शुभ कार्य में बाधा आती हो या विलम्ब होता हो तो रविवार को भैरों जी के मंदिर में सिंदूर का चोला चढ़ा कर “बटुक भैरव स्तोत्र´´ का एक पाठ कर के गौ, कौओं और काले कुत्तों को उनकी रूचि का पदार्थ खिलाना चाहिए। ऐसा वर्ष में 4-5 बार करने से कार्य बाधाएं नष्ट हो जाएंगी।

3॰ रूके हुए कार्यों की सिद्धि के लिए यह प्रयोग बहुत ही लाभदायक है। गणेश चतुर्थी को गणेश जी का ऐसा चित्र घर या दुकान पर लगाएं, जिसमें उनकी सूंड दायीं ओर मुड़ी हुई हो। इसकी आराधना करें। इसके आगे लौंग तथा सुपारी रखें। जब भी कहीं काम पर जाना हो, तो एक लौंग तथा सुपारी को साथ ले कर जाएं, तो काम सिद्ध होगा। लौंग को चूसें तथा सुपारी को वापस ला कर गणेश जी के आगे रख दें तथा जाते हुए कहें `जय गणेश काटो कलेश´।

4॰ सरकारी या निजी रोजगार क्षेत्र में परिश्रम के उपरांत भी सफलता नहीं मिल रही हो, तो नियमपूर्वक किये गये विष्णु यज्ञ की विभूति ले कर, अपने पितरों की `कुशा´ की मूर्ति बना कर, गंगाजल से स्नान करायें तथा यज्ञ विभूति लगा कर, कुछ भोग लगा दें और उनसे कार्य की सफलता हेतु कृपा करने की प्रार्थना करें। किसी धार्मिक ग्रंथ का एक अध्याय पढ़ कर, उस कुशा की मूर्ति को पवित्र नदी या सरोवर में प्रवाहित कर दें। सफलता अवश्य मिलेगी। सफलता के पश्चात् किसी शुभ कार्य में दानादि दें।

5॰ व्यापार, विवाह या किसी भी कार्य के करने में बार-बार असफलता मिल रही हो तो यह टोटका करें- सरसों के तैल में सिके गेहूँ के आटे व पुराने गुड़ से तैयार सात पूये, सात मदार (आक) के पुष्प, सिंदूर, आटे से तैयार सरसों के तैल का रूई की बत्ती से जलता दीपक, पत्तल या अरण्डी के पत्ते पर रखकर शनिवार की रात्रि में किसी चौराहे पर रखें और कहें -“हे मेरे दुर्भाग्य तुझे यहीं छोड़े जा रहा हूँ कृपा करके मेरा पीछा ना करना।´´ सामान रखकर पीछे मुड़कर न देखें।

6॰ सिन्दूर लगे हनुमान जी की मूर्ति का सिन्दूर लेकर सीता जी के चरणों में लगाएँ। फिर माता सीता से एक श्वास में अपनी कामना निवेदित कर भक्ति पूर्वक प्रणाम कर वापस आ जाएँ। इस प्रकार कुछ दिन करने पर सभी प्रकार की बाधाओं का निवारण होता है।

7॰ किसी शनिवार को, यदि उस दिन `सर्वार्थ सिद्धि योग’ हो तो अति उत्तम सांयकाल अपनी लम्बाई के बराबर लाल रेशमी सूत नाप लें। फिर एक पत्ता बरगद का तोड़ें। उसे स्वच्छ जल से धोकर पोंछ लें। तब पत्ते पर अपनी कामना रुपी नापा हुआ लाल रेशमी सूत लपेट दें और पत्ते को बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें। इस प्रयोग से सभी प्रकार की बाधाएँ दूर होती हैं और कामनाओं की पूर्ति होती है।

८॰ रविवार पुष्य नक्षत्र में एक कौआ अथवा काला कुत्ता पकड़े। उसके दाएँ पैर का नाखून काटें। इस नाखून को ताबीज में भरकर, धूपदीपादि से पूजन कर धारण करें। इससे आर्थिक बाधा दूर होती है। कौए या काले कुत्ते दोनों में से किसी एक का नाखून लें। दोनों का एक साथ प्रयोग न करें।

9॰ प्रत्येक प्रकार के संकट निवारण के लिये भगवान गणेश की मूर्ति पर कम से कम 21 दिन तक थोड़ी-थोड़ी जावित्री चढ़ावे और रात को सोते समय थोड़ी जावित्री खाकर सोवे। यह प्रयोग 21, 42, 64 या 84 दिनों तक करें।

10॰ अक्सर सुनने में आता है कि घर में कमाई तो बहुत है, किन्तु पैसा नहीं टिकता, तो यह प्रयोग करें। जब आटा पिसवाने जाते हैं तो उससे पहले थोड़े से गेंहू में 11 पत्ते तुलसी तथा 2 दाने केसर के डाल कर मिला लें तथा अब इसको बाकी गेंहू में मिला कर पिसवा लें। यह क्रिया सोमवार और शनिवार को करें। फिर घर में धन की कमी नहीं रहेगी।


11॰ आटा पिसते समय उसमें 100 ग्राम काले चने भी पिसने के लियें डाल दिया करें तथा केवल शनिवार को ही आटा पिसवाने का नियम बना लें।

12॰ शनिवार को खाने में किसी भी रूप में काला चना अवश्य ले लिया करें।

13॰ अगर पर्याप्त धर्नाजन के पश्चात् भी धन संचय नहीं हो रहा हो, तो काले कुत्ते को प्रत्येक शनिवार को कड़वे तेल (सरसों के तेल) से चुपड़ी रोटी खिलाएँ।

14॰ संध्या समय सोना, पढ़ना और भोजन करना निषिद्ध है। सोने से पूर्व पैरों को ठंडे पानी से धोना चाहिए, किन्तु गीले पैर नहीं सोना चाहिए। इससे धन का क्षय होता है।

15॰ रात्रि में चावल, दही और सत्तू का सेवन करने से लक्ष्मी का निरादर होता है। अत: समृद्धि चाहने वालों को तथा जिन व्यक्तियों को आर्थिक कष्ट रहते हों, उन्हें इनका सेवन रात्रि भोज में नहीं करना चाहिये।

16॰ भोजन सदैव पूर्व या उत्तर की ओर मुख कर के करना चाहिए। संभव हो तो रसोईघर में ही बैठकर भोजन करें इससे राहु शांत होता है। जूते पहने हुए कभी भोजन नहीं करना चाहिए।

17॰ सुबह कुल्ला किए बिना पानी या चाय न पीएं। जूठे हाथों से या पैरों से कभी गौ, ब्राह्मण तथा अग्नि का स्पर्श न करें।

18॰ घर में देवी-देवताओं पर चढ़ाये गये फूल या हार के सूख जाने पर भी उन्हें घर में रखना अलाभकारी होता है।

19॰ अपने घर में पवित्र नदियों का जल संग्रह कर के रखना चाहिए। इसे घर के ईशान कोण में रखने से अधिक लाभ होता है।

20॰ रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र हो, तब गूलर के वृक्ष की जड़ प्राप्त कर के घर लाएं। इसे धूप, दीप करके धन स्थान पर रख दें। यदि इसे धारण करना चाहें तो स्वर्ण ताबीज में भर कर धारण कर लें। जब तक यह ताबीज आपके पास रहेगी, तब तक कोई कमी नहीं आयेगी। घर में संतान सुख उत्तम रहेगा। यश की प्राप्ति होती रहेगी। धन संपदा भरपूर होंगे। सुख शांति और संतुष्टि की प्राप्ति होगी।

21॰ `देव सखा´ आदि 18 पुत्रवर्ग भगवती लक्ष्मी के कहे गये हैं। इनके नाम के आदि में और अन्त में `नम:´ लगाकर जप करने से अभीष्ट धन की प्राप्ति होती है। यथा - ॐ देवसखाय नम:, चिक्लीताय, आनन्दाय, कर्दमाय, श्रीप्रदाय, जातवेदाय, अनुरागाय, सम्वादाय, विजयाय, वल्लभाय, मदाय, हर्षाय, बलाय, तेजसे, दमकाय, सलिलाय, गुग्गुलाय, ॐ कुरूण्टकाय नम:।

22॰ किसी कार्य की सिद्धि के लिए जाते समय घर से निकलने से पूर्व ही अपने हाथ में रोटी ले लें। मार्ग में जहां भी कौए दिखलाई दें, वहां उस रोटी के टुकड़े कर के डाल दें और आगे बढ़ जाएं। इससे सफलता प्राप्त होती है।

23॰ किसी भी आवश्यक कार्य के लिए घर से निकलते समय घर की देहली के बाहर, पूर्व दिशा की ओर, एक मुट्ठी घुघंची को रख कर अपना कार्य बोलते हुए, उस पर बलपूर्वक पैर रख कर, कार्य हेतु निकल जाएं, तो अवश्य ही कार्य में सफलता मिलती है।

24॰ अगर किसी काम से जाना हो, तो एक नींबू लें। उसपर 4 लौंग गाड़ दें तथा इस मंत्र का जाप करें : `ॐ श्री हनुमते नम:´। 21 बार जाप करने के बाद उसको साथ ले कर जाएं। काम में किसी प्रकार की बाधा नहीं आएगी।

25॰ चुटकी भर हींग अपने ऊपर से वार कर उत्तर दिशा में फेंक दें। प्रात:काल तीन हरी इलायची को दाएँ हाथ में रखकर “श्रीं श्रीं´´ बोलें, उसे खा लें, फिर बाहर जाए¡।

26॰ जिन व्यक्तियों को लाख प्रयत्न करने पर भी स्वयं का मकान न बन पा रहा हो, वे इस टोटके को अपनाएं।
प्रत्येक शुक्रवार को नियम से किसी भूखे को भोजन कराएं और रविवार के दिन गाय को गुड़ खिलाएं। ऐसा नियमित करने से अपनी अचल सम्पति बनेगी या पैतृक सम्पति प्राप्त होगी। अगर सम्भव हो तो प्रात:काल स्नान-ध्यान के पश्चात् निम्न मंत्र का जाप करें। “ॐ पद्मावती पद्म कुशी वज्रवज्रांपुशी प्रतिब भवंति भवंति।।´´

27॰ यह प्रयोग नवरात्रि के दिनों में अष्टमी तिथि को किया जाता है। इस दिन प्रात:काल उठ कर पूजा स्थल में गंगाजल, कुआं जल, बोरिंग जल में से जो उपलब्ध हो, उसके छींटे लगाएं, फिर एक पाटे के ऊपर दुर्गा जी के चित्र के सामने, पूर्व में मुंह करते हुए उस पर 5 ग्राम सिक्के रखें। साबुत सिक्कों पर रोली, लाल चन्दन एवं एक गुलाब का पुष्प चढ़ाएं। माता से प्रार्थना करें। इन सबको पोटली बांध कर अपने गल्ले, संदूक या अलमारी में रख दें। यह टोटका हर 6 माह बाद पुन: दोहराएं।

28॰ घर में समृद्धि लाने हेतु घर के उत्तरपश्चिम के कोण (वायव्य कोण) में सुन्दर से मिट्टी के बर्तन में कुछ सोने-चांदी के सिक्के, लाल कपड़े में बांध कर रखें। फिर बर्तन को गेहूं या चावल से भर दें। ऐसा करने से घर में धन का अभाव नहीं रहेगा।

29॰ व्यक्ति को ऋण मुक्त कराने में यह टोटका अवश्य सहायता करेगा : मंगलवार को शिव मन्दिर में जा कर शिवलिंग पर मसूर की दाल “ॐ ऋण मुक्तेश्वर महादेवाय नम:´´ मंत्र बोलते हुए चढ़ाएं।

30॰ जिन व्यक्तियों को निरन्तर कर्ज घेरे रहते हैं, उन्हें प्रतिदिन “ऋणमोचक मंगल स्तोत्र´´ का पाठ करना चाहिये। यह पाठ शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार से शुरू करना चाहिये। यदि प्रतिदिन किसी कारण न कर सकें, तो प्रत्येक मंगलवार को अवश्य करना चाहिये।

31॰ सोमवार के दिन एक रूमाल, 5 गुलाब के फूल, 1 चांदी का पत्ता, थोड़े से चावल तथा थोड़ा सा गुड़ लें। फिर किसी विष्णुण्लक्ष्मी जी के मिन्दर में जा कर मूर्त्ति के सामने रूमाल रख कर शेष वस्तुओं को हाथ में लेकर 21 बार गायत्री मंत्र का पाठ करते हुए बारी-बारी इन वस्तुओं को उसमें डालते रहें। फिर इनको इकट्ठा कर के कहें की `मेरी परेशानियां दूर हो जाएं तथा मेरा कर्जा उतर जाए´। यह क्रिया आगामी 7 सोमवार और करें। कर्जा जल्दी उतर जाएगा तथा परेशानियां भी दूर हो जाएंगी।

32॰ सर्वप्रथम 5 लाल गुलाब के पूर्ण खिले हुए फूल लें। इसके पश्चात् डेढ़ मीटर सफेद कपड़ा ले कर अपने सामने बिछा लें। इन पांचों गुलाब के फुलों को उसमें, गायत्री मंत्र 21 बार पढ़ते हुए बांध दें। अब स्वयं जा कर इन्हें जल में प्रवाहित कर दें। भगवान ने चाहा तो जल्दी ही कर्ज से मुक्ति प्राप्त होगी।

34॰ कर्ज-मुक्ति के लिये “गजेन्द्र-मोक्ष´´ स्तोत्र का प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व पाठ अमोघ उपाय है।

35॰ घर में स्थायी सुख-समृद्धि हेतु पीपल के वृक्ष की छाया में खड़े रह कर लोहे के बर्तन में जल, चीनी, घी तथा दूध मिला कर पीपल के वृक्ष की जड़ में डालने से घर में लम्बे समय तक सुख-समृद्धि रहती है और लक्ष्मी का वास होता है।

33॰ अगर निरन्तर कर्ज में फँसते जा रहे हों, तो श्मशान के कुएं का जल लाकर किसी पीपल के वृक्ष पर चढ़ाना चाहिए। यह 6 शनिवार किया जाए, तो आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त होते हैं।

36॰ घर में बार-बार धन हानि हो रही हो तों वीरवार को घर के मुख्य द्वार पर गुलाल छिड़क कर गुलाल पर शुद्ध घी का दोमुखी (दो मुख वाला) दीपक जलाना चाहिए। दीपक जलाते समय मन ही मन यह कामना करनी चाहिए की `भविष्य में घर में धन हानि का सामना न करना पड़े´। जब दीपक शांत हो जाए तो उसे बहते हुए पानी में बहा देना चाहिए।

37॰ काले तिल परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर सात बार उसार कर घर के उत्तर दिशा में फेंक दें, धनहानि बंद होगी।

38॰ घर की आर्थिक स्थिति ठीक करने के लिए घर में सोने का चौरस सिक्का रखें। कुत्ते को दूध दें। अपने कमरे में मोर का पंख रखें।

39॰ अगर आप सुख-समृद्धि चाहते हैं, तो आपको पके हुए मिट्टी के घड़े को लाल रंग से रंगकर, उसके मुख पर मोली बांधकर तथा उसमें जटायुक्त नारियल रखकर बहते हुए जल में प्रवाहित कर देना चाहिए।

40॰ अखंडित भोज पत्र पर 15 का यंत्र लाल चन्दन की स्याही से मोर के पंख की कलम से बनाएं और उसे सदा अपने पास रखें।

41॰ व्यक्ति जब उन्नति की ओर अग्रसर होता है, तो उसकी उन्नति से ईर्ष्याग्रस्त होकर कुछ उसके अपने ही उसके शत्रु बन जाते हैं और उसे सहयोग देने के स्थान पर वे ही उसकी उन्नति के मार्ग को अवरूद्ध करने लग जाते हैं, ऐसे शत्रुओं से निपटना अत्यधिक कठिन होता है। ऐसी ही परिस्थितियों से निपटने के लिए प्रात:काल सात बार हनुमान बाण का पाठ करें तथा हनुमान जी को लड्डू का भोग लगाए¡ और पाँच लौंग पूजा स्थान में देशी कर्पूर के साथ जलाएँ। फिर भस्म से तिलक करके बाहर जाए¡। यह प्रयोग आपके जीवन में समस्त शत्रुओं को परास्त करने में सक्षम होगा, वहीं इस यंत्र के माध्यम से आप अपनी मनोकामनाओं की भी पूर्ति करने में सक्षम होंगे।

42॰ कच्ची धानी के तेल के दीपक में लौंग डालकर हनुमान जी की आरती करें। अनिष्ट दूर होगा और धन भी प्राप्त होगा।

43॰ अगर अचानक धन लाभ की स्थितियाँ बन रही हो, किन्तु लाभ नहीं मिल रहा हो, तो गोपी चन्दन की नौ डलियाँ लेकर केले के वृक्ष पर टाँग देनी चाहिए। स्मरण रहे यह चन्दन पीले धागे से ही बाँधना है।

44॰ अकस्मात् धन लाभ के लिये शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार को सफेद कपड़े के झंडे को पीपल के वृक्ष पर लगाना चाहिए। यदि व्यवसाय में आकिस्मक व्यवधान एवं पतन की सम्भावना प्रबल हो रही हो, तो यह प्रयोग बहुत लाभदायक है।

45॰ अगर आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हों, तो मन्दिर में केले के दो पौधे (नर-मादा) लगा दें।

46॰ अगर आप अमावस्या के दिन पीला त्रिकोण आकृति की पताका विष्णु मन्दिर में ऊँचाई वाले स्थान पर इस प्रकार लगाएँ कि वह लहराता हुआ रहे, तो आपका भाग्य शीघ्र ही चमक उठेगा। झंडा लगातार वहाँ लगा रहना चाहिए। यह अनिवार्य शर्त है।

47॰ देवी लक्ष्मी के चित्र के समक्ष नौ बत्तियों का घी का दीपक जलाए¡। उसी दिन धन लाभ होगा।

48॰ एक नारियल पर कामिया सिन्दूर, मोली, अक्षत अर्पित कर पूजन करें। फिर हनुमान जी के मन्दिर में चढ़ा आएँ। धन लाभ होगा।

49॰ पीपल के वृक्ष की जड़ में तेल का दीपक जला दें। फिर वापस घर आ जाएँ एवं पीछे मुड़कर न देखें। धन लाभ होगा।

50॰ प्रात:काल पीपल के वृक्ष में जल चढ़ाएँ तथा अपनी सफलता की मनोकामना करें और घर से बाहर शुद्ध केसर से स्वस्तिक बनाकर उस पर पीले पुष्प और अक्षत चढ़ाए¡। घर से बाहर निकलते समय दाहिना पाँव पहले बाहर निकालें।

51॰ एक हंडिया में सवा किलो हरी साबुत मूंग की दाल, दूसरी में सवा किलो डलिया वाला नमक भर दें। यह दोनों हंडिया घर में कहीं रख दें। यह क्रिया बुधवार को करें। घर में धन आना शुरू हो जाएगा।

52॰ प्रत्येक मंगलवार को 11 पीपल के पत्ते लें। उनको गंगाजल से अच्छी तरह धोकर लाल चन्दन से हर पत्ते पर 7 बार राम लिखें। इसके बाद हनुमान जी के मन्दिर में चढ़ा आएं तथा वहां प्रसाद बाटें और इस मंत्र का जाप जितना कर सकते हो करें। `जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करो गुरू देव की नांई´ 7 मंगलवार लगातार जप करें। प्रयोग गोपनीय रखें। अवश्य लाभ होगा।

53॰ अगर नौकरी में तरक्की चाहते हैं, तो 7 तरह का अनाज चिड़ियों को डालें।

54॰ ऋग्वेद (4/32/20-21) का प्रसिद्ध मन्त्र इस प्रकार है -
`ॐ भूरिदा भूरि देहिनो, मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि। ॐ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुरूत्रा शूर वृत्रहन्। आ नो भजस्व राधसि।।´
(हे लक्ष्मीपते ! आप दानी हैं, साधारण दानदाता ही नहीं बहुत बड़े दानी हैं। आप्तजनों से सुना है कि संसारभर से निराश होकर जो याचक आपसे प्रार्थना करता है उसकी पुकार सुनकर उसे आप आर्थिक कष्टों से मुक्त कर देते हैं - उसकी झोली भर देते हैं। हे भगवान मुझे इस अर्थ संकट से मुक्त कर दो।)

51॰ निम्न मन्त्र को शुभमुहूर्त्त में प्रारम्भ करें। प्रतिदिन नियमपूर्वक 5 माला श्रद्धा से भगवान् श्रीकृष्ण का ध्यान करके, जप करता रहे -
“ॐ क्लीं नन्दादि गोकुलत्राता दाता दारिद्र्यभंजन।
सर्वमंगलदाता च सर्वकाम प्रदायक:। श्रीकृष्णाय नम:।।´´

52॰ भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष भरणी नक्षत्र के दिन चार घड़ों में पानी भरकर किसी एकान्त कमरे में रख दें। अगले दिन जिस घड़े का पानी कुछ कम हो उसे अन्न से भरकर प्रतिदिन विधिवत पूजन करते रहें। शेष घड़ों के पानी को घर, आँगन, खेत आदि में छिड़क दें। अन्नपूर्णा देवी सदैव प्रसन्न रहेगीं।

53॰ किसी शुभ कार्य के जाने से पहले -
रविवार को पान का पत्ता साथ रखकर जायें।
सोमवार को दर्पण में अपना चेहरा देखकर जायें।
मंगलवार को मिष्ठान खाकर जायें।
बुधवार को हरे धनिये के पत्ते खाकर जायें।
गुरूवार को सरसों के कुछ दाने मुख में डालकर जायें।
शुक्रवार को दही खाकर जायें।
शनिवार को अदरक और घी खाकर जाना चाहिये।

54॰ किसी भी शनिवार की शाम को माह की दाल के दाने लें। उसपर थोड़ी सी दही और सिन्दूर लगाकर पीपल के वृक्ष के नीचे रख दें और बिना मुड़कर देखे वापिस आ जायें। सात शनिवार लगातार करने से आर्थिक समृद्धि तथा खुशहाली बनी रहेगी।

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सोमवार, 15 अगस्त 2011

मालिश की कार्य प्रणाली

परिचय-

प्राचीनकाल से ही मनुष्य मालिश को अपने अच्छे स्वास्थ्य के लिए इस्तेमाल करता आ रहा है। भारत में ही नहीं, विश्व के अन्य देशों में भी मालिश का उपयोग बहुत पहले से होता आ रहा है। कई हजार साल पहले चीन मे मालिश को बहुत महत्त्व दिया जाता था तथा इसे रोगों को दूर करने की अचूक पद्धति माना जाता था। चीन के लोगों का मानना था कि शरीर को स्वस्थ और सुन्दर रखने में मालिश बहुत सहायक सिद्ध होती है। जो लोग मालिश करते थे, उन्हें समाज में बड़ा आदर-सम्मान मिलता था। आज जो आदर व सम्मान डॉक्टरों को प्राप्त है, वही आदर-सम्मान उस समय मालिश-विशेषज्ञों को प्राप्त था।

जापान ने चीन से यह विद्या सीखी तथा उसे अपने देश के कोने-कोने तक पहुंचाया। इन देशों में आज भी मालिश का विशेष स्थान है। जापान में मालिश करने का ढंग सबसे अलग है। वहां चिकोटी भरना, मुक्के मारना और कसकर हाथ से रगड़ना आदि अनेकों प्रकार से मालिश की जाती है। आराम से या हल्के से मालिश करना न उन्हें आता है और न ही उन्हें इस प्रकार से मालिश करने से कोई सुख मिलता है।

भारत, चीन और जापान के अलावा यूनान, रोम, तुर्की, मिस्त्र और फारस जैसे देश भी मालिश की महत्ता को जानते थे तथा उसका उपयोग करते थे। ईसा से 500 साल पहले जिम्नास्टिक का आविष्कार करने वाले `हीरोडिक्स´ अपने रोगियों को मालिश कराने का सुझाव देते थे। ईसा से 460 साल पहले यूनान के पास स्थित कासद्वीप में जन्मे तथा कुछ आधुनिक दवाइयों के आविष्कारक हिप्पोकेटीज ने भी अपने ग्रंथों में मालिश के गुणों को बढ़ चढ़कर बताया है। उन्होंने मालिश द्वारा कई प्रकार के रोगों को दूर करने के उपचार भी बताए है। यूनानियों के प्राचीन साहित्य, उनके बुतों और चित्रों को देखकर आसानी ही अनुमान लगाया जा सकता है कि वे मालिश के किस कदर शौकीन रहें होगे। मालिश और व्यायाम ही उनके अच्छे और स्वस्थ शरीर का राज था। यह भी कहा जाता है कि उन्हें मालिश तथा व्यायाम का बहुत शौक था। बाद में स्त्रियों से मालिश कराने की प्रथा चल पड़ी। यूनान के होमर नामक एक प्रसिद्व कवि ने अपने `ओडिसी´ नामक महाकाव्य में मालिश की लोकिप्रयता का वर्णन किया है तथा लिखा है कि उस समय जब योद्धा युद्ध के मैदान से लौटकर आते थे, तो उनकी पत्नियां तथा दासियां उनके शरीर की मालिश किया करती थीं। शरीर की थकावट और कसावट को दूर करने के लिए हल्की थपकी के रूप में उनकी मालिश की जाती थीं।

इतिहास में देखने से पता चलता है कि इन देशों में जब योद्धा युद्ध के बाद वापस घर लौटते थे तो स्त्रियों से अपने शरीर की मालिश कराते थे। उस समय इन देशों में दास-प्रथा का भी प्रचलन था। राजा-महाराजा अपने शरीर को सुन्दर और बलिष्ठ बनाने के लिए अपनी खूब मालिश कराया करते थे। जिससे उनका शरीर सुन्दर और सुडौल यानी आकर्षक हो जाता था। सुन्दर और स्वस्थ शरीर को गर्व का प्रतीक माना जाता था।

एक यूनानी चिकित्सक ने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम के साथ मालिश करने की आवश्यकता के बारे में काफी विस्तार से बताया था।

ईसा से काफी साल पहले इस मशहूर राजा न्यूरेल्जिया (नाड़ी-संस्थान का एक रोग) से पीड़ित था। वह इस रोग से निजात पाने के लिए प्रतिदिन अपने शरीर पर एक खास किस्म की मालिश कराया करता था।

एक रोमन डॉक्टर ने बताया था कि सूरज के प्रकाश में खड़ें होकर मालिश कराने से पुराने दर्द और बीमारियों आदि से छुटकारा पाया जा सकता है। साथ ही उसने यह भी बताया था कि अधंरग (शरीर के आधे भाग में लकवा आना) आदि रोगों से ग्रस्त टांगों, बाजुओं आदि को शक्ति देने तथा उनमे जान पैदा करने के लिए मालिश करना बहुत लाभदायक होता है। उसका मानना था कि इससे रोग जल्दी ठीक हो जाते हैं।

तुर्क लोग स्नान करने से पहले अपने शरीर की मालिश किया करते थे, परन्तु यह मालिश वैज्ञानिक ढंग की न होकर साधारण होती थी। प्राचीनकाल में अफ्रीकी लोगों में विवाह से 1 महीने पहले से वर-वधू की प्रतिदिन मालिश करने की प्रथा थी। उनका मानना था कि इससे यौवन फूट पड़ता है, जो सच भी है। हमारे देश में भी ऐसी ही एक प्रथा पाई जाती है, जिसे हल्दी की रस्म कहते है। काफी हजार साल पहले मेडागास्कर नामक अफ्रीकी जंगली जाति के लोग रोगियों के शरीर में खून के दौरे (रक्त-संचार) के लिए मालिश का उपयोग किया करते थे।

पुराने समय में मिस्रवासियों को मालिश का बहुत बड़ा विशेषज्ञ माना जाता था। मिस्रवासियों ने ही रोमनों तथा यूनानियों को मालिश की कला सिखाई थी। मिस्र की एक बहुत प्रसिद्ध रानी अपने बालों में जैतून के तेल की मालिश कराया करती थी जिस कारण उसके बाल अपने समय के बहुत ही आकर्षक तथा सौन्दर्य-सम्पन्न बाल थे। एक बहुत ही महान विद्वान ने लिखा है कि आधुनिक शब्द `मसाज´ अरबी शब्द `मास´ से बना है, जिसका अर्थ मांसपेशियों को हाथ से दबाने तथा जोड़ों पर मालिश करने की एक कला है। यह अंगों को लचीला और कर्मशील बनाने तथा आलस्य को समाप्त करके शरीर में फुर्ती का संचार करता है।

फ्रांसीसियों ने मालिश करने की कला अरबवासियों से सीखी थी, जिसे उन्होंने अपने देश और अन्य यूरोपीय देशों तक पहुंचाया।

इतिहास से यह भी पता चलता है कि हीरोनिमस फेबरीक्स ए.बी. एक्यूपेण्डट (1537-1619) ने यूरोप में मालिश के चिकित्सात्मक पहलू के महत्त्व को दोबारा जीवित किया था। पेरासेल्सस नामक एक लेखक ने अपनी पुस्तक द मेडिसिन अगियपशन -1591 में मालिश करने की अनेक विधियों को विभिन्न प्रयोगों के द्वारा समझाने की कोशिश की है।

उसके यह अनुभव मिस्र में प्रचलित मालिश की पद्धति पर आधारित थे। इसके अलावा अनेक फ्रांसीसी लेखकों ने भी मालिश को अपने साहित्य में स्थान दिया है। सन् 1818 में प्रकाशित फ्रांस के पहले विश्व-कोष में पियोरे ने मालिश के गुणों पर एक विस्तृत विवेचना की है।

इंग्लैण्ड के इतिहास से पता चलता है कि वहां मालिश का प्रयोग प्राय: चिकित्सा की दृष्टि से ही होता रहा है तथा वहां मालिश मेडिकल रबिंग नाम से जानी जाती है। कहा जाता है कि वहां मालिश करने वाले वेतन पर काम किया करते थे और धनी और बड़े जमींदारों के यहां स्थाई तौर पर मालिश करते थे।

सन् 1863 में मालिश पर आधारित एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी जो लोगों द्वारा बहुत पसन्द की गई तथा बहुत अधिक संख्या में बिकी भी थी। परगैमस के `स्कूल ऑफ ग्लेडियेटर´ के एक डॉक्टर गैलेन, 1830 ने व्यायाम से पहले शरीर को तैयार करने के लिए तब तक रगड़ने का नियम निकाला था, जब तक कि शरीर लाल न हो जाए।

एक महान चिकित्सक ने लगभग सन 1575 में मोटापा दूर करने, रक्त-संचार (खून का बहाव) बढ़ाने और जोड़ों के स्थानांतरित हो जाने पर उन्हें उनके स्थान पर लाने आदि के लिए हल्की और तेज मालिश का आविष्कार किया था, जिसके परिणाम उनकी आशा के साथ ठीक मिले थे।

फारस के बादशाह का डॉक्टर हॉफमैन ने भी मालिश और व्यायाम करने पर बहुत जोर दिया करता था। उसका मानना था कि इससे शरीर स्वस्थ रहता है, रोगों से छुटकारा मिलता है तथा शरीर की रोगों से लड़ने की शक्ति में बढ़ोत्तरी होती है।

ऑक्सफोर्ड के सर्जन ग्रासवेनर ने मालिश द्वारा जोड़ों के दर्द तथा अकड़न का सफल इलाज करके ख्याति प्राप्त की थी। उन्हीं दिनों लगभग 1800 ई. में एडिनबरा के मिस्टर बॉलफोर ने मालिश, ठोकना और दबाव क्रिया से गठिया, जोड़ों के दर्द और अनेक प्रकार की बीमारियों को ठीक किया था।

सन् 1813 में स्टॉकहोम में रॉयल इंस्टीट्यूट स्थापित की गई और डॉक्टर पीटर हैनरी लिंग ने मालिश करने के लिए एक नए ढंग की खोज की। बाद में यह पद्धति मालिश के नाम से प्रसिद्ध हुई। उन्होंने मालिश को वैज्ञानिक रूप दिया तथा शरीर-रचना के अनुसार उपयुक्त मालिश करने की पद्धति आरम्भ की। कहा जाता है कि हैनरी लिंग ने मालिश करने के नए ढंग की खोज निकालने में चीनी ग्रंथ कांग फो से सहायता ली थी और हैनरी लिंग ही वह व्यक्ति थे, जिन्होंने स्वदेशी जिमनास्टिक पद्धति का आविष्कार किया था। हैनरी लिंग ने मालिश को मुख्य रूप से 3 भागों में बांटा गया है।

पहला- सक्रिय अंग-विक्षेप (एक्टिव मूवमेंट्स), दूसरा- निष्क्रिय अंग-विक्षेप (पैसिव मूवमेंट्स) और तीसरा- दुष्क्रिय अंग-विक्षेप (रेजिस्टिव मूवमेंट्स)।

  • सक्रिय अंग-विक्षेप :- तेल से या सूखे हाथों से पूरे ‘शरीर की मालिश की जाती है या मांसपेशियों को रगड़कर कोमल बनाया जाता है।
  • निष्क्रिय अंग-विक्षेप :- हल्की थपकी, कंपन और ताल आदि क्रियाओं के माध्यम से जोड़ों, रक्त की नलिकाओं और नाड़ी-तन्त्र पर प्रभाव डाला जाता है।
  • दुष्क्रिय अंग-विक्षेप :- इसमें दबाव डालकर धीरे-धीरे मालिश करनी होती है। इससे शरीर के रोगों को दूर करने में विशेष सहायता मिलती है तथा गठिया (जोड़ों का दर्द), अधरंग (शरीर के आधे भाग में लकवा आना) और दर्द आदि बीमारियों में भी इस क्रिया का लाभ मिलता है।

वर्णन-

डॉक्टर मज्गर के शिष्यों प्रोफेसर मोनसन जिल, बेरहम तथा हेलडे आदि ने भी मालिश की नई-नई तकनीके निकालीं और उनसे अनेक प्रकार के रोगियों को रोग से मुक्त किया। इसके बाद हर तरफ मालिश को अपनाया जाने लगा।

सन् 1877 में अमरीकी डॉक्टर वेयर मिचेल ने भी मालिश को एक लाभदायक पद्धति साबित करने में खासा योगदान दिया था। उन्होने `न्युरस्थिनियां´ के रोगियों को मालिश से ठीक करके इसकी उपयोगिता सिद्ध की। उसके बाद मालिश का चिकित्सा के रूप में प्रयोग किया जाने लगा तथा सभी देशों के प्रसिद्ध डॉक्टरों तथा सर्जनों ने इसे अपनाना शुरू कर दिया।

इसके अलावा मालिश के बारे में अनेक विदेशी डॉक्टर हुए, जिन्होंने मालिश के बारे में अनेक साहित्य लिखे और मालिश की उपयोगिता को समझाया। एक प्रसिद्ध पश्चिमी लेखक `मैकन्जी´ ने अपनी लोकिप्रय किताब शिक्षा और औषधियों के प्रयोग´ में मालिश के गुणों की विस्तृत रूप से व्याख्या की। मैकन्जी का कहना था की स्नायु-संस्थान के लिए मालिश सबसे उपयोगी कसरत है, जिससे शरीर में होने वाले चार प्रधान कार्य होते हैं जैसे (रक्त-संचालन (खून का उचित बहाव), श्वास-क्रिया (सांस लेना), पाचन और मल को त्यागने में सहायक होना।

म्युनिक विश्वविद्यालय के प्लास्टिक सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉक्टर केलर ने मालिश और सर्जरी को सगी बहनें बताया है। एक बार मालिश के बारे में समझाते हुए केलर ने कहा कि जिस प्रकार सर्जरी द्वारा हम शरीर के अन्दर के गंदे भाग को काटकर बाहर फेंक देते हैं, उसी प्रकार मालिश भी शरीर के विकारों को रक्त के द्वारा फेंक देती है। सामान्य शब्दों में कहने से तात्पर्य यह है कि मालिश से स्वास्थ्य और सौन्दर्य दोनों में ही काफी बढोत्तरी होती है। डॉक्टर केलर ने खुद भी मालिश के कई प्रयोगों द्वारा अनेक बदसूरत महिलाओं को सुन्दरता प्राप्त करते हुए देखा है।

सिंपल ब्यूटी टिप्स

सिंपल ब्यूटी टिप्स

* बादाम, गुलाब के फूल, चिरौंजी और पिसा जायफल रात को दूध में भिगो दें। सुबह इसे पीसकर इसका उबटन लगाएँ। इससे चेहरे के दाग-धब्बे मिटते हैं और त्वचा कांतिमय बनती है।

* चंदन, गुलाब जल, पोदीने का रस एवं अंगूर का रस मिलाकर पेस्ट बनाएँ और उसे चेहरे पर लगाएँ। कुछ देर बाद ठंडे पानी से चेहरा धो लें। इस फेस पैक से चेहरे की झुर्रियाँ मिटती हैं।

* धूप में अक्सर हमारी त्वचा झुलस जाती है और काली पड़ जाती है। त्वचा के रंग को पहले की तरह बनाने के लिए आम के पत्ते, जामुन, दारूहल्दी, गुड़ और हल्दी की बराबर मात्रा मिलाकर उसका पेस्ट बनाकर पूरे शरीर पर लगाएँ। कुछ समय रखने के बाद स्नान कर लें। इस लेप से त्वचा की रंगत निखरती है।

* दो चम्मच सोयाबीन का आटा, एक बड़ा चम्मच दही व शहद मिलाकर पेस्ट बनाएँ तथा इस मिश्रण को कुछ देर चेहरे पर लगाकर चेहरा धो लें। इससे त्वचा में कसावट आती है।

* नीम की पत्तियाँ, गुलाब की पत्तियाँ, गेंदे का फूल सभी को एक कटोरी पानी में उबालें तथा इस रस को चेहरे पर लगाएँ। इससे मुहाँसे निकलना बंद हो जाते हैं।

बालों की देखभाल के टि‍प्‍स

बालों की देखभाल के टि‍प्‍स


1. बालों में मसाज जरूर करें।

2. स्टीम बाथ लें।

3. सूर्य स्नान करें।

4. गर्दन के व्यायाम करें।

5. प्राणायाम और मेडिटेशन करें।

6. भरपूर पानी पिएँ।

7. भरपूर नींद लें।

8. बालों को स्वच्छ रखने के लिए दिन में दो तीन बार कंघी करें।

9. दूसरों की कंघी, तौलिया आदि कभी भी इस्तेमाल नहीं करें।

बाल काला करने के घरेलू उपचार

बाल काला करने के घरेलू उपचार

* आमलकी रसायन आधा चम्मच प्रतिदिन सेवन करने से बाल प्राकृतिक रूप से जड़ से काले हो जाते हैं।

* एक छोटी कटोरी मेहँदी पावडर लें, इसमें दो बड़े चम्मच चाय का पानी, दो चम्मच आँवला पावडर, शिकाकाई व रीठा पावडर, एक चम्मच नीबू का रस, दो चम्मच दही, एक अंडा (जो अंडा न लेना चाहें वे न लें), आधा चम्मच नारियल तेल व थोड़ा-सा कत्था। यह सामग्री लोहे की कड़ाही में रात को भिगो दें। सुबह हाथों में दस्ताने पहनकर बालों में लगाएँ, त्वचा को बचाएँ, ताकि रंग न लगने पाए। दो घंटे बाद धो लें। यह आयुर्वेदिक खिजाब है, इससे बाल काले होंगे, लेकिन इन्हें कोई नुकसान नहीं होगा।

* सफेद बालों को कभी भी उखाड़ें नहीं, ऐसा करने से ये ज्यादा संख्या में बढ़ते हैं। सफेद बाल निकालना हों तो कैंची से काट दें या उन्हें काला करने वाला उपाय अपनाएँ।

* त्रिफला, नील, लोहे का बुरादा- तीनों 1-1 चम्मच लेकर भृंगराज पौधे के रस में डालकर रात को लोहे की कड़ाही में रख दें। प्रातः इसे बालों में लगाकर, सूख जाने के बाद धो डालें।

* रात को सोते समय नाक में दोनों तरफ षडबिन्दु तेल की 2-2 बूँद नियमित रूप से टपकाते रहें।

ये सभी प्रयोग धीरे-धीरे बालों को काला करने वाले हैं। कोई भी एक प्रयोग लगातार 5-6 माह तक करते रहें। षडबिन्दु तेल का प्रयोग अन्य प्रयोग करते हुए भी कर सकते हैं।

तो होंठ नहीं फटेंगे

तो होंठ नहीं फटेंगे !

मौसम कोई भी हो,ठंडी बयार जब त्वचा से टकराती या उसको छूती है तो त्वचा शुष्क हो जाती है। इसका अधिक असर होंठों पर पड़ता। खासकर सितंबर आते-आते अजीब सा मौसम हो जाता है। कभी ठंडा, कभी गर्म। ऐसे में होंठों का फटना आम समस्या बन जाती है। होंठों के फटने से पूरे चेहरे का सौंदर्य चौपट हो जाता है। चेहरे की खूबसूरती को बनाए रखने के लिए होंठों का स्वस्थ होना जरूरी है। ठंडी हवा के अतिरिक्त और कारण भी हो सकते हैं, जिनसे होंठ की त्वचा खराब होकर फट जाती है, उन पर पपड़ी जमी रहती है या दरारें पड़ जाती हैं।

होंठों की त्वचा बहुत ही कोमल और पतली होती है। इस जगह कोई ऐसी ग्रंथि नहीं होती, जो इन्हें चिकना बनाए रख सके। नमी की कमी ही होंठों के सूखने और फटने का मुख्य कारण होती है। यदि आपका खानपान गलत है और किसी रोग से पीड़ित हैं तो आपके होंठ ही इसका सबूत दे देते हैं। पर यदि आप सचेत हैं तो अपनी इस समस्या को आने से पहले ही रोक सकती हैं।

यदि आपके होंठ फट चुके हैं तो उन्हें ठीक करने पर ध्यान दें। जैतून का तेल और वैसलीन मिलाकर दिन में तीन या चार बार फटे होंठों पर लगाएँ। तीन-चार दिन नियमित उपचार करने पर आपके होंठों की दरारें भरने लगेंगी या भर जाएँगी।

दरारें होने पर थोड़ा-सा शहद लेकर होंठों पर उँगली से धीरे-धीरे मलें। कुछ ही दिनों के प्रयास से आपके होंठ पहले की तरह चमकदार और मुलायम हो जाएँगे। दो बड़े चम्मच कोकोआ बटर, आधा छोटा चम्मच मधु वैक्स लें। उबलते पानी पर एक बर्तन में वैक्स डालकर पिघला लें। इसमें कोकोआ बटर मिलाएँ। अब इस मिश्रण को ठंडा होने दें। इसे लिप ब्रश की मदद से होंठों पर लगाएँ। इससे होंठों का सौंदर्य बना रहेगा।

पपड़ी का जमा रहना होंठों का रोग ही बन गया है तो आप इससे भी निजात पा सकती हैं। इसके लिए एक छोटा चम्मच मेहँदी की जड़, करीब 60 मि.ग्रा. बादाम का तेल, 15 ग्राम बीज वैक्स लें। मेहँदी की जड़ को कूट लें और दस दिन तक इसे बादाम के तेल में भिगोएँ। दस दिन बाद तेल को छान लें। मोम को पहली विधि के अनुसार ही गरम पानी पर रखकर पिघला लें। अच्छी तरह से फेंटें। इसे लिप ब्रश से होंठों पर लगाना शुरू कर दें।

होंठों की त्वचा खुरदरी हो गई हो तो रात को सोने से पहले चेहरे को धोकर होंठों को अच्छी तरह से साफ कर लें। इसके बाद होंठों पर क्रीम, मलाई, मक्खन या देशी घी हल्के हाथों से कुछ देर मलें। होंठों की त्वचा इससे एक जैसी होकर मुलायम बनी रहेगी।

होंठ कुछ ज्यादा ही फटे-फटे से रहते हैं तो टमाटर के रस में घी या मक्खन मिलाकर लगाएँ। जब तक होंठों की त्वचा चिकनी नहीं हो जाती, यह उपाय जारी रखें।

मौसम कोई भी हो, होंठों पर इसका प्रभाव न हो इसके लिए शरीर में विटामिन ए व बी कॉम्प्लेक्स की कमी न होने दें। इसके लिए अपने दैनिक आहार में हरी सब्जी, दूध, घी, मक्खन, ताजे फल और ज्यूस लेती रहें। आप लिपस्टिक लगाने की शौकीन हैं तो एक बात का ध्यान हमेशा रखें।

यदि लिपस्टिक हर समय लगी रही तो होंठों पर दरारें तो पड़ेंगी ही, साथ ही उनकी गुलाबी रंगत भी बदल जाएगी। यदि होंठ ज्यादा ही कटे-फटे हो रहे हैं तो उन पर सीधी लिपस्टिक न लगाएँ। इससे होंठों पर पपड़ी और धब्बे बन सकते हैं। पहले उन्हें चिकना करने के लिए लिप ब्रश से वैसलीन की हल्की परत लगाएँ। उसके बाद केवल अच्छी क्वॉलिटी की लिपस्टिक का ही प्रयोग करें।

यदि आप अपने होंठों को हर मौसम में ही स्वस्थ रखना चाहती हैं तो देशी गुलाब की भीगी हुई पत्तियों को होंठों पर कुछ देर तक नियमित मलें। इससे आपके होंठ बिना लिपस्टिक के भी नेचुरल गुलाबी आभा लिए चमकते रहेंगे। अँगरेजी के 'ओ' और 'ई' अक्षर को कुछ देर तक बोलें। धीरे-धीरे सीटी बजाना भी होंठों के लिए अच्छी कसरत है। इन दिनों रात को सोते समय पेट्रोलियम जेली या एंटीसेप्टिक क्रीम लगाकर सोने से भी होंठ नहीं फटेंगे।

गर्म-ठंडी मसाज

परिचय-

किसी भी व्यक्ति के शरीर पर गर्म-ठंडी मालिश करने से पहले उसके शरीर को गर्म कर लिया जाता है। इसके बाद शरीर को ठंडा करके मालिश की जाती है। यह मालिश उन रोगियों के लिए विशेष लाभदायक है, जो नाड़ी की कमजोरी के रोग से पीड़ित हों या जिनकी नस-नाड़ियां बहुत कमजोर हो गई हों, जिस कारण वे सर्दी-गर्मी सहन न कर सकते हों। ऐसे रोगियों के लिए यह मालिश काफी लाभदायक होती है। जुड़े हुए जोड़ों, गठिया, वात रोगों तथा अधरंग आदि रोगों में भी यह मालिश विशेष लाभकारी होती हैं।

यदि आप किसी रोगी की यह मालिश करने जा रहे हैं, तो सबसे पहले रोगी के शरीर को गर्म पानी की बोतल से सेंक कर गर्म कर लें। फिर इसके बाद ठंडी मालिश आरम्भ करें। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि ठंडी-गर्म मालिश में ठंडी मालिश की तरह जोर से घर्षण नहीं दिया जाता, बल्कि ये घर्षण बहुत धीरे-धीरे देने चाहिए। इसमें बाकी सभी नियम ठंडी मालिश से मिलते-जुलते हैं। रोगी को सूखे तौलिए से अच्छी तरह रगड़कर व अच्छी तरह गर्म करके भी ठंडी मालिश दी जाती है, परन्तु इस क्रिया का प्रयोग किसी कमजोर रोगी पर कभी भी नहीं करना चाहिए। उनके अंगों को गर्म बोतल की सेंक देकर ही उनकी ठंडी मालिश करनी चाहिए। गठिया तथा जुड़े हुए जोड़ों वाले रोगियों के शरीर पर हाथ चलाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि आपके घर्षण से उन्हें पीड़ा का एहसास न होने पाए, इसलिए ठंडी मालिश को काफी सावधानी से करना चाहिए।

स्वस्थ व्यक्ति भी घर बैठे-बैठे इस मालिश का लाभ उठा सकते हैं, जैसे कि हर व्यक्ति सुबह स्नान करता है तो स्नान करते समय वह अपनी मालिश थोड़े समय में ही कर सकता है। सुबह स्नान करने से पहले अपने शरीर को हाथों से या किसी सूखे तौलिए से घर्षण देकर गर्म कर लें। घर्षण मात्र 5-7 मिनट तक ही दें, उसके बाद ठंडे पानी से स्नान कर लें। ठंडे पानी से भी अपने शरीर को रगड़कर मल लें। इस प्रकार की मालिश और स्नान से शरीर के रोमकूप खुल जाते हैं। शरीर का मैल धुल जाता है तथा चर्मरोग से सम्बंधी रोग दूर हो जाते हैं। त्वचा में शुद्ध खून का संचार तेजी से होता है, जिससे किसी तरह के चर्मरोग नहीं हो सकते। यह भी एक प्रकार की गर्म-ठंडी मालिश करने का ढंग है।

तेल मालिश-

तेल मालिश एक ऐसा उपचार है, जिसमें पूरे शरीर पर तेल मलकर सिलसिलेवार ढंग से गूंथा जाता है। मरीज को आराम की अवस्था में इस तेल मालिश के लिए विशेष रूप से बनाई गई एक गद्देदार मेज पर लिटाया जाता है। मालिश करने का यह काम हाथों से किया जाता है। मालिश शरीर के उस भाग में की जाती है, जिसका इलाज किया जाना होता है। आधे घंटे तक शरीर को थपका जाता है, रगड़ा जाता है, एक प्रकार से गूंथा जाता है, हल्के-हल्के दबाया जाता है तथा हिलाया-डुलाया जाता है।

ये क्रियाएं खून के बहने की दिशा से की जाती है। मालिश की शुरुआत शरीर में दाहिनी ओर दाहिने पैर के साथ होती है और अन्त में सिर और गर्दन की बारी आती है।

असली मालिश तो असल में तेल से ही की जा सकती है। तेल की सहायता से हम अपना हाथ पूरे शरीर पर आसानी से चला सकते हैं। तेल मालिश मांसपेशियों को ढीला करती है, त्वचा को सीधी खुराक पहुंचाती है तथा शरीर में लचक पैदी करती है। रोगों में अधिकतर तेल की मालिश ही करनी चाहिए। वात रोगों, अधरंग (आधे शरीर में लकवा होना), पोलियो, चोट, हड्डी टूटने आदि रोगों में तेल की मालिश काफी लाभकारी होती है।

ठंडी मालिश

ठंडी मालिश तेल से की जाती है। तेल की मालिश से कहने का अभिप्राय यह है कि हम खून को दिल की तरफ ले जाएं, इसलिए यह मालिश नीचे से ऊपर की ओर करते हुए चलते हैं और नसों को तेज करते हैं, परन्तु ठीक इसके विपरीत ठंडी मालिश में हमें धमनियों को तेज करना होता है और उन्हें चलाना होता है। इसलिए यह नीचे से ऊपर की ओर की जाती है। तेल मालिश दिल से नीचे की तरफ की जाती है। कहने का अभिप्राय हैं कि शरीर का यह नियम है कि शरीर के जिस अंग को ठंडा कर दिया जाएगा, रक्त वहां तेजी से भागकर आएगा तथा ठंडे अंग को गर्म करेगा।

उदाहरण के लिए आपने सुना या देखा ही होगा कि बुखार यानी ज्वर से पीड़ित रोगी के माथे पर ठंडे पानी की पटि्टयां रखी जाती हैं तथा पेट पर भी ठंडी पटि्टयां रखी जाती है तो वह गर्म हो जाती है क्योंकि जब वे पटि्टयां अंग को ठंडा करती हैं, तो रक्त उन अंगों को गर्म कर देता है, जिससे पटि्टयां भी गर्म हो जाती है। यदि हम गीले कपड़े को अपने किसी अंग से लगाकर रखते हैं, तो वह गीला कपड़ा गर्म हो जाता है। इसका भी कारण यही है कि जब अंग ठंडा हो जाता है तो धमनियों का खून वहां तेज हो जाता है और खून उस अंग को अधिक गर्मी देकर जल्दी गर्म कर देता है। इसलिए ठंडी मालिश हमेशा धमनियों को तेज करती है। जब शुद्ध रक्त एक स्थान पर जाएगा तो उस अंग को शक्ति मिलेगी, उस अंग में छिपे विकार को वहां से हटना पड़ेगा। इसी को ठंडी मालिश कहते हैं।

तेल मलना :-

इस क्रिया में तेल को रोग वाले अंग पर लगाकर धीरे-धीरे नीचे से ऊपर की ओर दबाव डालकर मलना होता है। तेल सभी अंगों पर लगाना चाहिए, परन्तु दबाव केवल मांसपेशियों पर ही देना चाहिए, हडि्डयों पर नहीं।

लाभकारी-

तेल मलने से शरीर में समा जाता है, त्वचा नर्म होती है, रक्त-संचार में वृद्वि होती है तथा मांसपेशियों शिथिल होती है। इससे मालिश के आधुनिक तरीकों को अपनाने के लिए आपका शरीर तैयार हो जाता है।

मर्दन करना, टांगों की मालिश

परिचय-

मालिश करना एक प्रकार की क्रिया होती है, जो विशेषज्ञों की देखरेख में ही करनी चाहिए परन्तु यहां पर हम `स्वयं अपनी मालिश के ढंग´ या तरीको को समझा रहे हैं जैसे हाथों, पैरो और टांगों आदि की मालिश जो इस प्रकार से हैं।

  • सबसे पहले टांगों पर तेल मलने के बाद जमीन पर बैठ जाएं। अब अपना दायां हाथ दोनों टांगों के बीच ले जाकर बाएं पांव के टखने पर गोलाई में जमाएं। अब अपनी दाई टांग का दबाव दाएं हाथ की कोहनी पर तथा बाएं हाथ का दबाव बाएं घुटने पर डालें। इससे टांग एक अवस्था में स्थिर रहेगी। अब अपना दायां हाथ ऊपर की तरफ घुटनों तक धीरे-धीरे मालिश करते हुए ले जाएं। आपका हाथ बाई टांग के स्थान पर रहने दें। बाजू पर दाई टांग का दबाव होने के कारण हाथ खुद ही फिसलता जाएगा। यह क्रिया 4-5 बार करें।
  • अब अपने बाएं हाथ को बाईं टांग के घुटने से हटा लें तथा उसी टांग के टखने पर जमाएं। अब दबाव डालकर हाथ से मालिश करते हुए घुटने तक ले जाएं। इस समय आप बाई टांग के दूसरे भाग की मालिश कर रहे हैं, इस क्रिया को भी 2-3 बार करें।
  • हर क्रिया के बाद अपने दोनों हाथ ढीले रखकर पूरी टांग पर ऊपर-नीचे घर्षण करें। इससे आपके हाथ और टांगों में ढीलापन आ जाता हैं।
  • अब पहले वाली स्थिति में आ जाएं। फिर अपने हाथों को एक दूसरे के ऊपर रखकर बाएं घुटने के पास जांघ पर रखें। उसके बाद दबाव डालते हुए अपने हाथों से जांघों पर मालिश करते हुए नीचे की तरफ ले जाएं। अपने हाथों को थोड़ा दाएं-बाएं करके भी यह क्रिया करें। ऐसा केवल आप 3 से 4 बार कर सकते हैं।
  • अब बाई टांग को सामने की तरफ ऊंची करके फैलाएं। उसके बाद अपने दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में फंसाकर हाथ बांध लें तथा अब अपने हाथों को टांग के नीचे से पांव के तलवे पर रखें। हाथ इस प्रकार गोल होने चाहिए कि वे टांग के नीचे से पांव के तलवे पर बैठ जाएं। अब जोर लगाते हुए धीरे-धीरे हाथों को जांघों की तरफ लाएं। हाथों को पीछे खींचते समय आपको थोड़ा लेटना भी पड़ेगा, तथा आप अच्छी तरह जोर लगा सकेंगें तथा आपका हाथ भी टांगों पर ठीक प्रकार चल सकेगा। इस क्रिया को 3 से 4 बार कर सकते हैं।
  • अब फिर से पहले की तरह बैठ जाएं। इस क्रिया में आपको अपना हाथ घुटने के पास जांघों पर नहीं रखना है बल्कि अपनी बाईं बाजू को जांघों के नीचे से निकालकर अन्दर-बाहर रखें। दूसरी बाजू भी इसी प्रकार निकालें। अब अपने दोनों बाजुओं को अन्दर-बाहर करते हुए जांघों के निचले भाग की मालिश करें।
  • इस क्रिया में भी पहले की ही तरह बैठे रहें। फिर अपने एक हाथ को चूड़ी का आकार देकर टखने को पकड़ लें। उसके बाद हाथ की चूड़ी को दबाकर घुमाते हुए घुटनों तक लाएं। इस क्रिया को `मरोड़ना क्रिया´ के नाम से भी जानते हैं। अब घुटनों पर चारों तरफ से मालिश करें फिर दोबारा अपने हाथ की चूड़ी बनाकर दबाव के साथ पूरी जांघ पर चलाएं। यह क्रिया भी 4-5 बार करें। इस बात का अवश्य ध्यान रखें कि पिण्डलियों के ऊपर की हड्डी पर दबाव नहीं पड़ना चाहिए बल्कि केवल पिंडली और आस-पास की मांसपेशियों पर ही दबाव पड़ना चाहिए। एक स्थान पर चूड़ी चलाते समय उसी स्थान पर 2 से 3 बार अन्दर-बाहर चूड़ी घुमाएं और उसके बाद आगे बढ़ें।
  • पूरी टांग पर एक ही तरह से हाथ चलाना चाहिए।
  • जब टांगों की मालिश पूरी हो जाए, तो आखिर में आकृति 3 की भांति खड़ी ठोक, मुक्का मारना और कंपन आदि क्रियाओं को करना चाहिए।

इस प्रकार से आपकी एक टांग की मालिश पूरी हो जाएगी। इसके बाद आप दूसरी टांग की मालिश भी इसी तरह से कर सकते हैं।