मंगलवार, 24 सितंबर 2013

राहु, शनि, शुक्र, गुरु, बुध, मंगल, चन्द्र, सूर्य ग्रह की शान्ति के उपाय


केतु शान्ति के उपाय-

यदि आपकी जन्म कुण्डली में केतु अशुभ फल दे रहा हो तो निम्न उपाय करने से उसकी अशुभता में कमी लायी जा सकती है।
वैदिक मंत्र- ॐ  केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्य्याऽपेशसे। समुषभ्दिरजायथाः।।
पौराणिक मंत्र- ॐ पलाश पुष्प सकाशं तारका ग्रह मस्तकम्। रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम्।।
तंत्रोक्त मंत्र- ॐ स्रां, स्रीं, स्रौं, सः केतवे नमः।
केतु गायत्री- ॐ पद्म पुत्राय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो केतु प्रचोदयात्।।
जप संख्या- 17000
रत्न- केतु हेतु लहसुनिया रत्न पंचधातु की अंगुठी में विधिवत् धारण करनी चाहिए।
दान हेतु वस्तुएं-  लोहा, बकरा, नारियल, तिल, सप्तधान्य, धूम्र वर्ण का वस्त्र, लोहे का चाकू, कपिला गाय दक्षिणा सहित दान करनी चाहिए।
अन्य उपाय- श्री गणेश जी की उपासना, कुत्तों को चपाती देना, पक्षियों को दाना देना लाभकारी होता है।

राहु ग्रह की शान्ति के उपाय-

यदि जन्म कुण्डली में राहु अशुभ फल दे रहा हो तो निम्न उपाय करने से लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
वैदिक मंत्र- ॐ कयानश्चित्रऽआभुवदूती सदावृधः सखा कया शचिष्ठया वृता।
पौराणिक मंत्र- ॐ अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्य विमर्दनम्। सिंहिका गर्भ सम्भूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्।।
तंत्रोक्त राहु मंत्र- ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः।
राहु गायत्री मंत्र – ॐ शिरो रूपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो राहुः प्रचोदयात्।।
जप संख्या- 18000 हजार ।
रत्न- राहु ग्रह की शांति हेतु गोमेद रत्न धारण किया जाता है
राहु दान सामग्री- सप्तधान्य, गोमेद, सीसा, काला घोड़ा, तिल, चांदी का सर्प, उड़द, कम्बल, नारियल, काला या नीला वस्त्र, तलवार।

शनि की शान्ति के लिए उपाय

शनि की शान्ति के लिए उपाय- शनि देव यदि जन्म कुण्डली में अशुभ फल दे रहे हों तो निम्न उपायों से शुभ लाभ लिया जा सकता है।
वैदिक मंत्र- ॐ शन्नो देवी रभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शंय्यो रभिस्त्रवन्तु नः।
पौराणिक मंत्र- ॐ नीलाजंन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। छाया मार्तण्ड सम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्।।
तंत्रोक्त मंत्र- ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।
जप संख्या- 23000।
शनि गायत्री- ॐ भग्भवाय विद्महे मृत्युरुपाय धीमहि, तन्नो सौरी:प्रचोदयात।
दान की वस्तुएं- लोहा, तिल, उड़द, सरसों का तेल, काला वस्त्र, काली गाय, कुल्थी, लौह निर्मित पात्र, जूता, भैंस, कस्तूरी, सुवर्ण, नारियल, काले अथवा नीले पुष्प।
रत्न- शनि के शुभत्व में वृद्धि हेतु नीलम रत्न धारण किया जाता है।
अन्य उपाय- शनिवार का व्रत रखना चाहिए। शिव स्तोत्र व शनि स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। शनि यंत्र धारण करना चाहिए। हनुमान जी की उपासना से भी लाभ होता है। पक्षियों व मछलियों को आटा डालना व मांसादि का परहेज करना चाहिए।

शुक्र ग्रह के शान्ति के उपाय-

शुक्र ग्रह के शान्ति के उपाय-
वैदिक मंत्र - ॐ अन्नात्परिस्रुतो रसं ब्रह्मणा क्षत्रं पयः सोमं प्रजापति। ऋतेन सत्यमिन्द्रियं वियान ℧ शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।।
पौराणिक मंत्र - ॐ हिम कुन्द मृणालाभं दैत्यानां परमं गुरूम् सर्व शास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम्।
तन्त्रोक्त मंत्र - ॐ द्रां, द्रीं दौं सः शुक्राय नमः।
जप संख्या – 16000।
शुक्र गायत्री मंत्र - ॐ भृगुराजाय विद्महे दिव्य देहाय धीमहि तन्नो शुक्र प्रचोदयात्।।
दान की वस्तुएं- चांदी चावल, सुवर्ण, दूध, दही, श्वेत वस्त्र, श्वेत घोड़ा, श्वेत पुष्प, श्वेत फल, सुगन्धित पदार्थ, दक्षिणा।
रत्न - शुक्र ग्रह हेतु हीरा धारण किया जाता है।
अन्य उपाय - शुक्रवार का व्रत धारण करना चाहिए। कुष्ट रोगियों को शुक्रवार के दिन खिचड़ी खिलाना शुभ होता है। शुक्रवार को माता संतोषी की पूजा कर श्वेत चन्दन का तिलक लगायें।

गुरु ग्रह की शान्ति हेतु उपाय

गुरु ग्रह की शान्ति हेतु उपाय- यदि जन्म कुण्डली में गुरु ग्रह अशुभ फल दे रहा हो तो निम्नांकित मंत्रों के जप करने से इसकी अशुभता में कमी आ जाती है।
वैदिक मंत्र- ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु। यद्दीदयच्दवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।
पुराणोक्त मंत्र- ॐ देवानां च ऋषीणां च गुरु कांचन संन्निभम्। बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्।।
तंत्रोक्त मंत्र- ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः ।
जप संख्या- 19000।
गुरु गायत्री मंत्र- ॐ अंगिरो जाताय विद्महे वाचस्पतये धीमहि तन्नो गुरु प्रचोदयात्।।
रत्न- गुरु के शुभत्व में वृद्धि हेतु सोने या चांदी में सवा पांच रत्ती का पुखराज शुभ मुहूर्त में धारण करना चाहिए।
यंत्र- गुरु यंत्र को सोने या चांदी के पत्र पर लिखवाकर या भोजपत्र पर अष्टगंध से लिखकर पूजा प्रतिष्ठा करवाकर गले या दाहिनी भुजा में धारण करना चाहिए।
दान सामग्री- पीले वस्त्र, पुखराज, पीले चावल, चने की दाल, हल्दी, शहद,पीले फल, घी धर्म ग्रन्थ, सुवर्ण पीली मिठाई दक्षिणा आदि।
अन्य उपाय- गुरु की प्रसन्नता हेतु बृहस्पति वार का व्रत धारण करना चाहिए। पीले पुष्पों से पूजन करना चाहिए, केशर का तिलक लगाना चाहिए, श्री विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ करना, गौ सेवा करना, पीले वस्त्रों का प्रयोग करना, व दानादि से इनकी अशुभता को कम किया जा सकता है।

बुध ग्रह के शान्ति के उपाय-

कुण्डली में बुध ग्रह की अशुभता को निम्न उपायों से कम किया जा सकता है।
वैदिक मंत्र- ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते स℧ सृजेथामयं च। अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वेदेवा यजमानश्च सीदत।
पुराणोक्त बुध मंत्र- ॐ प्रियंगु कलिका श्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम्। सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम्।
तंत्रोक्त बुध मंत्र- ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः।
जप संख्या-  9000।
दान की वस्तुएं-  चीनी, हरे पुष्प, हरी इलाइची, मूंग दाल, कांस्य पत्र, पन्ना सोना, हाथी दांत, हरी सब्जी हरा कपड़ा।
रत्न-  हरे रंग का पन्ना सवा पांच रत्ती से अधिक सोने की अंगुठी में विधि पूर्वक हाथ की कनिष्ठिका या अनामिका में धारण करें।
यंत्र-  बुध के यंत्र को चांदी कं पत्र पर खुदवाकर या भोजपत्र पर अष्टगंध से लिखवाकर उसकी विधिवत पूजा कर दायें भुजा में धारण करें।
अन्य उपाय- दुर्गा सप्तशती का पाठ व विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ करना चाहिए। भगवान गणेश जी की आराधना भी लाभप्रद होती है।

मंगल ग्रह शान्ति के उपाय-

मंगल ग्रह शान्ति के उपाय- मंगल ग्रह के बुरे प्रभाव को कम करने के लिए तथा मंगली दोष के शान्ति हेतु निम्न उपाय करने से इन दोषों का प्रभाव कम हो जाता है।
वैदिक मंत्र- ॐ अग्निमूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्। अपा℧ रे ता℧ सिजिन्वति।।
पुराणोक्त मंत्र- ॐ धरणी गर्भ संभूतं विद्युत्कान्ति समप्रभम्।कुमारं शक्ति हस्तं ते मंगल प्रणमाम्यहम्।।
तन्त्रोक्त मंत्र- ॐ क्रां क्री क्रौं सः भौमाय नमः।
जप संख्या- 10000
मंगल गायत्री मंत्र- ॐ अंगारकाय विद्महे शक्ति हस्ताय धीमहि, तन्नो भौमः प्रचोदयात्।
दान सामग्री- मसूर की दाल, घी, सुवर्ण, मूंगा, ताम्र बर्तन, कनेर पुष्प, लाल चन्दन, लाल वस्त्र, केशर, नारियल, मीठी रोटी, गेहूं , मंगल का दान युवा ब्राह्मण को देना लाभप्रद रहता है।
रत्न- मंगल ग्रह को बली बनाने हेतु सवा पांच रत्ती से आठ रत्ती तक मूंगा सोने या तांबे की अंगूठी अनामिका में शुभ मूहूर्त में धारण करें।
यंत्र- मंगल यंत्र को ताम्रपत्र पर खुदवाकर मंगल की होरा में या भोजपत्र पर अष्टगंध से लिखकर विधिवत पूजा कर गले में या दायें बाजू में धारण करना चाहिए।
अन्य उपाय- मंगल वार का व्रत धारण करना चाहिए, मंगली दोष के कारण यदि किसी कन्या का विवाह नहीं हो पा रहा हो तो मंगला गौरी का व्रत लगातार सात मंगलवार करने से लाभ होता है। हनुमान चालीसा का पाठ व उपासना करनी चाहिए। जटा नारियल में सिंदूर, मौली को लाल वस्त्र में लपेटकर मंत्र सहित चलते पानी में बहाना, गाय को मीठी रोटी खिलाना, आदि लाभप्रद रहते हैं ।

चन्द्र ग्रह शांति के उपाय

चन्द्र ग्रह शांति के उपाय– जन्म कुंडली में चंद्र ग्रह यदि अशुभ कारक हो तो निम्न लिखित मन्त्रों का जप करने से चंद्र ग्रह की शांति हो जाती है।
वैदिक मंत्र– ॐइमं देवा असपत्न℧ सुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठाय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणाना ℧ राजा।
पुराणोक्त मंत्र- ॐ दधिशंख, तुषाराम्भं क्षीरोदार्णव सम्भवम्।नमामि शशिनं सोमं शंभोः मुकुट भूषणम्।।
स्नान तथा दान काल में यह मंत्र का उच्चारण लाभप्रद होता है।
तंत्रोक्त मंत्र- ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः।
चन्द्रमा के जप की संख्या 11000 है।
चन्द्र गायत्री मंत्र- ॐ अमृतांगाय विद्महे कला रूपाय धीमहि तन्नो सोमः प्रचोदयात्।
अर्घ्य मंत्र- ॐ सों सोमाय नमः।
चन्द्र रत्न- चन्द्र ग्रह की अशुभता के निवारण हेतु मोती रत्न धारण किया जाता है।
औषधि स्नान – चन्द्र ग्रह की शांति के लिए पंचगव्य, बेल गिरी, गजमद, शंख, सिप्पी,श्वेत चंदन, स्फटिक से स्नान करना चंद्रमा जनित अनिष्ट प्रभावों को कम करता है। भगवान शिव का पूजन सोमवार के दिन करना तथा पूर्ण चन्द्र के दिन चन्द्रमा को अर्घ्य प्रदान करने से चन्द्र ग्रह की शांति हो जाती है।
चन्द्र यंत्र- चन्द्रमा ग्रह की शान्ति हेतु चन्द्र होरा में चांदी के पत्र में चन्द्र यंत्र खुदवाकर या अष्टगन्ध से भोजपत्र पर लिखकर उसकी विधिवत, पूजन कर गले या दाहिनी भुजा में धारण करना चाहिए। अन्य उपाय- सोमवार का व्रत रखकर चावल सफेद वस्त्र, आदि सफेद वस्तुओं का दान करना चाहिए। सोमवार को प्रातः काल स्नानादि करके भगवान शंकर की मूर्ति पर जल तथा दूध चढाना चाहिए।

सूर्य ग्रह शान्ति

यदि कुण्डली में कोई ग्रह योग कारक होकर अशुभ फल दे रहा हो उस ग्रह का विधि पूर्वक पूजन अवश्य करना चाहिए। आज हम ग्रहों के शान्ति हेतु जप, मंत्र, दान आदि की विधि बता रहे हैं।
सूर्य ग्रह के शान्ति हेतु उपाय- सूर्य ग्रह हमारे संसार के नियोक्ता व शक्ति के प्रमुख स्रोत हैं।
वेदोक्त मंत्र - ॐ आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मत्र्यं च।हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्।।
पुराणोक्त मंत्र – जपा कुसुम संकाशं काशिपेयं महाद्युतिम। तमोऽरिं सर्व पापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्।।
सूर्य गायत्री मंत्र - ॐ आदित्याय विद्महे भास्कराय धीमहि तन्नो भानुः प्रचोदयात्।
तंत्रोक्त सूर्य बीज मंत्र -ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नम:
लघु मंत्र -ॐ घृणि सूर्याय नमः।
सूर्यार्घ्य मंत्र – एहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजो राशि जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्तया गृहाणार्घ्यदिवाकरः।।
सूर्य नारायण जी की जप संख्या 7000 है। मंत्र संख्या का विधिवत जप करके दशांश हवन करना चाहिए।
सूर्य दान - सूर्य दान हेतु वस्तुऐं गेहूं, गुड़, लाल वस्त्र, घी, सुवर्ण, माणिक्य, ताम्रपात्र, नारियल, लालचन्दन, लाल फूल, दक्षिणा, लाल दाल।
समय – सूर्य दानादि का समय सूर्योदय काल है।
सूर्य व्रत - रविवार का व्रत करने से सूर्य नारायण प्रसन्न होते हैं। व्रत का विधान हम पहले बता चुके हैं।
सूर्य रत्न – सूर्य ग्रह को बली बनाने हेतु माणिक्य रत्न धारण करना चाहिए।
सूर्य यंत्र – सूर्य यंत्र को तांबे पर खुदवाकर उसका नित्य पूजन करना चाहिए। सूर्य यंत्र को भोजपत्र पर अष्टगन्ध से लिखकर गले या दाहिने हाथ के बाजू पर धारण करना चाहिए।
औषधि स्नान- सूर्य ग्रह की शान्ति के लिए इलाइची, देवदारू, केशर, खस, रक्त पुष्प, रक्त चन्दन, कनेर पुष्प, गंगाजल, मनः शिला को मिलाकर रविवार के दिन स्नान करने से अत्यन्त लाभ प्राप्त होता है।इसके अलावा रविवार को केसर तिलक लगाना, सूर्य गायत्री, आदित्य हृदय स्तोत्र, एवं सूर्य कवच का पाठ, श्री विष्णु भगवान की उपासना करना लाभकारी होता है। रविवार के दिन अन्धाश्रम कुष्टाश्रम, अस्पताल में पकाये अन्न का दान करना लाभप्रद होता है।
सूर्य शान्ति के अन्य उपाय- सूर्योदय काल में ताम्रपात्र से भगवान सूर्य नारायण को जल दूध, पुष्प, गंध, लाल चन्दन आदि लेकर पूर्वाभिमुख होकर अर्घ्य देना चाहिए। रविवार के दिन नमक का परहेज रखें, ग्यारह रविवार पर्यनत केवल दही और चावल का सेवन करना चाहिए। रविवार के दिन लाल वर्ण की गाय को गुड़ मिलाकर आटा खिलावें।

शनि-राहु की इन सरल मंत्रों से करें पूजा..जल्द पास होगा खुद का मकान और वाहन

सांसारिक जीवन में व्यक्तिगत व पारिवारिक जीवन को सुखी व संपन्न बनाने की कोशिशें जन्म से लेकर मृत्यु तक लगातार चलती हैं। सुखों से भरे जीवन की कामनाओं को पूरा करने के लिए खासतौर पर हर इंसान बुद्धि, ज्ञान के साथ संतान, भवन, वाहन से समृद्ध होना चाहता है। जिसके लिये वह देव उपासना व शास्त्रों के उपाय भी अपनाता है।
ज्योतिष विज्ञान के मुताबिक जन्मकुण्डली में शनि-राहु की युति भी इन सुखों को नियत करने वाली होती है। खासतौर पर जब जन्मकुण्डली में शनि-राहु की युति चौथे भाव में बन रही हो। तब वह पांचवे भाव पर भी असर करती है। हालांकि दूसरे ग्रहों के योग और दृष्टि भी अच्छे और बुरे फल दे सकती है। लेकिन यहां मात्र शनि-राहु की युति के अशुभ प्रभाव की शांति के उपाय बताए जा रहे हैं।
हिन्दू पंचांग में शनिवार का दिन न्याय के देवता शनि की उपासना कर पीड़ा और कष्टों से मुक्ति का माना जाता है। यह दिन शनि की पीड़ा, साढ़े साती या ढैय्या से होने वाले बुरे प्रभावों की शांति के लिए भी जरूरी है। किंतु यह दिन एक ओर क्रूर ग्रह राहु की दोष शांति के लिए भी अहम माना जाता है। राहु के बुरे प्रभाव से भयंकर मानसिक पीड़ा और अशांति हो सकती है।
अगर आपको भी सुखों को पाने में अड़चने आ रही हो या कुण्डली में बनी शनि-राहु की युति से प्रभावित हो, तो यहां जानें ऐसे सुख व आनंद लेने के लिए शनि-राहु के दोष शांति के सरल उपाय -
- शनिवार की सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहन नवग्रह मंदिर में शनिदेव और राहु को शुद्ध जल से स्नान कर पंचोपचार पूजा करें और विशेष सामग्रियां अर्पित करें।
- शनि मंत्र ऊँ शं शनिश्चराये नम: और राहु मंत्र ऊँ रां राहवे नम: का जप करें। हनुमान चालीसा का पाठ भी बहुत प्रभावी होता है।
- शनिदेव के सामने तिल के तेल का दीप जलाएं। तेल से बने पकवानों का भोग लगाएं। लोहे की वस्तु चढाएं या दान करें।
- राहु की प्रसन्नता के लिए तिल्ली की मिठाईयां और तेल का दीप लगाएं। शनि  व राहु की धूप-दीप आरती करें।
समयाभाव होने पर नीचे लिखें उपाय भी न के वल आपकी मुसीबतों को कम करते हैं, बल्कि जीवन को सुख और शांति से भर देते हैं।
- किसी मंदिर में पीपल के वृक्ष में शुद्ध जल या गंगाजल चढ़ाएं। पीपल की सात परिक्रमा करें। अगरबत्ती, तिल के तेल का दीपक लगाएं। समय होने पर गजेन्दमोक्ष स्तवन का पाठ करें। इस बारे में किसी विद्वान ब्राह्मण से भी जानकारी ले सकते हैं।
- इसी तरह किसी मंदिर के बाहर बैठे भिक्षुक को तेल में बनी वस्तुओं जैसे कचोरी, समोसे, सेव, भुजिया यथाशक्ति खिलाएं या उस निमित्त धन दें।

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

छुहारे से रोग हारे

उपयोग : खजूर के पेड़ से रस निकालकर 'नीरा' बनाई जाती है, जो तुरन्त पी ली जाए तो बहुत पौष्टिक और बलवर्द्धक होती है और कुछ समय तक रखी जाए तो शराब बन जाती है। लेकिन यह शराब नुकसान करती है। इसके रस से गुड़ भी बनाया जाता है। इसका उपयोग वात और पित्त का शमन करने के लिए किया जाता है।

दमा : दमा के रोगी को प्रतिदिन सुबह-शाम 2-2 छुहारे खूब चबाकर खाना चाहिए। इससे फेफड़ों को शक्ति मिलती है और कफ व सर्दी का प्रकोप कम होता है।

छुहारे की गुठली निकाल कर दूध में उबाल कर गाढ़ा कर लें। छुहारे गलने के उपरांत सूखे मेवे डाल कर ओटा लें। यह तैयार दूध बढ़ते बच्चों के लिए गुणकारी होता है।

4 छुहारे एक गिलास दूध में उबाल कर ठण्डा कर लें। प्रातः काल या रात को सोते समय, गुठली अलग कर दें और छुहारे को खूब चबा-चबाकर खाएँ और दूध पी जाएँ। लगातार 3-4 माह सेवन करने से शरीर का दुबलापन दूर होता है, चेहरा भर जाता है। सुन्दरता बढ़ती है, बाल लम्बे व घने होते हैं और बलवीर्य की वृद्धि होती है।

बला (खिरैटी)

बला जिसे खिरैटी भी कहते हैं, यह जड़ी-बूटी वाजीकारक एवं पौष्टिक गुण के साथ ही अन्य गुण एवं प्रभाव भी रखती है अतः यौन दौर्बल्य, धातु क्षीणता, नपुंसकता तथा शारीरिक दुर्बलता दूर करने के अलावा अन्य व्याधियों को भी दूर करने की अच्छी क्षमता रखती है।

विभिन्न भाषाओं में नाम : संस्कृत- बला। हिन्दी- खिरैटी, वरियारा, वरियारा, खरैटी। मराठी- चिकणा। गुजराती- खरेटी, बलदाना। बंगला- बेडेला। तेलुगू- चिरिबेण्डा, मुत्तबु, अन्तिस। कन्नड़- किसंगी, हेटुतिगिडा। तमिल- पनियार तुट्टी। मलयालम- वेल्लुरुम। इंग्लिश- कण्ट्री मेलो। लैटिन- सिडा कार्डिफोलिया।

गुण : चारों प्रकार की बला शीतवीर्य, मधुर रसयुक्त, बलकारक, कान्तिवर्द्धक, स्निग्ध एवं ग्राही तथा वात रक्त पित्त, रक्त विकार और व्रण (घाव) को दूर करने वाली होती है।

परिचय : बला चार प्रकार की होती है, इसलिए इसे 'बलाचतुष्ट्य' कहते हैं। यूं इसकी और भी कई जातियां हैं पर बला, अतिबला, नागबला, महाबला- ये चार जातियां ही ज्यादा प्रसिद्ध और प्रचलित हैं।

मुख्यतः इसकी जड़ और बीज को उपयोग में लिया जाता है। यह झाड़ीनुमा 2 से 4 फीट ऊंचा क्षुप होता है, जिसका मूल और काण्ड (तना) सुदृढ़ होता है। पत्ते हृदय के आकार के 7-9 शिराओं से युक्त, 1 से 2 इंच लंबे और आधे से डेढ़ इंच चौड़े होते हैं। फूल छोटे पीले या सफेद तथा 7 से 10 स्त्रीकेसर युक्त होते हैं। बीज छोटे-छोटे, दानेदार, गहरे भूरे रंग के या काले होते हैं। यह देश के सभी प्रांतों में वर्षभर पाया जाता है।

उपयोग : अपने गुणों के कारण यह शारीरिक दुर्बलता, यौन शक्ति की कमी, प्रमेह, शुक्रमेह, रक्तपित्त, प्रदर, व्रण, मूत्रातिसार, सोजाक, उपदंश, हृदय दौर्बल्य, कृशता (दुबलापन), वात प्रकोप के कारण गृध्रसी, सिर दर्द, अर्दित, अर्धांग आदि वात विकारों को दूर करने के लिए उपयोगी सिद्ध होती है।

दुर्बलता : आधा चम्मच मात्रा में इसकी जड़ का महीन पिसा हुआ चूर्ण सुबह-शाम मीठे कुनकुने दूध के साथ लेने और भोजन में दूध-चावल की खीर शामिल कर खाने से शरीर का दुबलापन दूर होता है। शरीर सुडौल बनता है, सातों धातुएं पुष्ट व बलवान होती हैं तथा बल, वीर्य तथा ओज की खूब वृद्धि होती है।

खूनी बवासीर : बवासीर के रोगी को मल के साथ रक्त भी गिरे, इसे रक्तार्श यानी खूनी बवासीर कहते हैं। बवासीर रोग का मुख्य कारण खानपान की बदपरहेजी के कारण कब्ज बना रहना होता है। बला के पंचांग को मोटा-मोटा कूटकर डिब्बे में भरकर रख लें। प्रतिदिन सुबह एक गिलास पानी में 2 चम्मच (लगभग 10 ग्राम) यह जौकुट चूर्ण डालकर उबालें। जब चौथाई भाग पानी बचे तब उतारकर छान लें। ठण्डा करके एक कप दूध मिलाकर पी पाएं। इस उपाय से खून गिरना बंद हो जाता है।

कालसर्प दोष दूर करने के कुछ उपाय

यह है कालसर्प दोष शांति का अचूक काल सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी नाग पूजा का विशेष काल है। यह घड़ी ज्योतिष विज्ञान की दृष्टि से भी बहुत अहम मानी जाती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पंचमी तिथि के देवता शेषनाग हैं। इसलिए जन्म कुण्डली में राहु और केतु की विशेष स्थिति से बनने वाले कालसर्प योग की शांति के लिए यह दिन बहुत शुभ फल देने वाला माना जाता है।
कालसर्प योग का बुरा प्रभाव जीवन में अनेक तरह से पीड़ा और हर कार्य में बाधा पहुंचाता है। इसलिए अगर किसी व्यक्ति की कुण्डली में कालसर्प दोष हो तो इसकी शांति के लिए नागपंचमी का दिन नहीं चूकना
चाहिए।
नागपंचमी के दिन कालसर्प दोष शांति के लिए नाग और शिव की विशेष पूजा और उपासना जीवन में आ रही शारीरिक, मानसिक और आर्थिक परेशानियों और बाधाओं को दूर कर सुखी और शांत जीवन की राह आसान बनाती
है।
नागपंचमी पर्व पर कालसर्प योग, उसके अलग-अलग रुप, फल और दूर करने के उपायों पर विशेष लेख पढ़े इसी साईट पर आने वाले दिनों में -
कालसर्प दोष दूर करने के कुछ छोटे उपाय
1.श्रावण मास में 30 दिनों तक महादेव का अभिषेक करें।
2.सोमवार को शिव मंदिर में चांदी के नाग की पूजा करें, पितरों का स्मरण करें तथा श्रध्दापूर्वक बहते पानी या समुद्र में नागदेवता का विसर्जन करें।
3.प्रत्येक सोमवार को दही से भगवान शंकर पर - ओउम् हर हर महादेव' कहते हुए अभिषेक करें। ऐसा हर रोज श्रावण के महिने में करें।
4.सवा महीने जौ के दाने पक्षियों को खिलाएं।
5.सवा महीने देवदारु, सरसों तथा लोहवान - इन तीनों को जल में उबालकर उस जल से स्नान करें।
6.किसी शुभ मुहूर्त में ओउम् नम: शिवाय' की 11 माला जाप करने के उपरांत शिवलिंग का गाय केदूध से अभिषेक करें और शिव को प्रिय बेलपत्रा आदि सामग्रियां श्रध्दापूर्वक अर्पित करें। साथ ही तांबे का बना सर्प विधिवत पूजन के उपरांत शिवलिंग पर समर्पित करें।
7.हनुमान चालीसा का 108 बार पाठ करें और मंगलवार के दिन हनुमान जी की प्रतिमा पर लाल वस्त्रा सहित सिंदूर, चमेली का तेल व बताशा चढ़ाएं।
8.काल सर्प दोष निवारण यंत्रा घर में स्थापित करके उसकी नित्य प्रति पूजा करें और भोजनालय में ही बैठकर भोजन करें अन्य कमरों में नहीं।
9.किसी शुभ मुहूर्त में नागपाश यंत्रा अभिमंत्रित कर धारण करें और शयन कक्ष में बेडशीट व पर्दे लाल रंग के प्रयोग में लायें।
10.शुभ मुहूर्त में मुख्य द्वार पर अष्टधातु या चांदी का स्वस्तिक लगाएं और उसके दोनों ओर धातु निर्मित नाग
11. अमावस्या के दिन पितरों को शान्त कराने हेतु दान आदि करें तथा कालसर्प योग शान्ति पाठ कराये।

12. शनिवार को पीपल पर शिवलिंग चढ़ाये व मंत्र जाप करें (ग्यारह शनिवार तक)
13. 108 राहु यंत्रों को जल में प्रवाहित करें।

कालसर्प दोष की शान्ति हेतु नक्षत्र, योग, दिन, दिशा एवं समय का विशेष ध्यान रखा जाता है, तभी उपाय भी फलीभूत होते है।
कालसर्प दोष दूर करने के कुछ छोटे उपाय

1. यदि पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका में क्लेश हो रहा हो, आपसी प्रेम की कमी हो रही हो तो भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या बालकृष्ण की ‍मूर्ति जिसके सिर पर मोरपंखी मुकुट धारण हो घर में स्थापित करें एवं प्रति‍दिन उनका पूजन करें एवं ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय अथवा ऊँ नमो वासुदेवाय कृष्णाय नम: शिवाय का यथाशक्ति जाप करे। कालसर्प योग की शांति होगी।
2. यदि रोजगार में तकलीफ आ रही है अथवा रोजगार प्राप्त नहीं हो रहा है तो पलाश के फूल गोमूत्र में डूबाकर उसको बारीक करें। फिर छाँव में रखकर सुखाएँ। उसका चूर्ण बनाकर चंदन के पावडर में मिलाकर शिवलिंग पर त्रिपुण्ड बनाएँ। 21 दिन या 25 दिन में नौकरी अवश्य मिलेग‍ी।
3. यदि कुंडली में कालसर्प दोष है तो नित्य प्रति भगवान शिव के परिवार का पूजन करें। आपके हर काम होते चले जाएँगे।
4. यदि शत्रु से भय है तो चाँदी के अथवा ताँबे के सर्प बनाकर उनकी आँखों में सुरमा लगा दें, फिर किसी भी शिवलिंग पर चढ़ा दें, भय दूर होगा व शत्रु का नाश होगा।
5. शिवलिंग पर प्रतिदिन मीठा दूध (मिश्री मिली हो तो बहुत अच्‍छा) उसी में भाँग डाल दें, फिर चढ़ाएँ इससे गुस्सा शांत होता है, साथ ही सफलता तेजी से मिलने लगती है।
6. नारियल के गोले में सप्त धान्य(सात प्रकार का अनाज), गुड़, उड़द की दाल एवं सरसों भर लें व बहते पानी में बहा दें अथवा गंदे पानी में (नाले में) बहा दें। आपका चिड़चिड़ापन दूर होगा। यह प्रयोग राहूकाल में करें।
7. सबसे सरल उपाय- कालसर्प योग वाला युवा श्रावण मास में प्रतिदिन रूद्र-अभिषेक कराए एवं महामृत्युंजय मंत्र की एक माला रोज करें। जीवन में सुख शांति अवश्य आएगी और रूके काम होने लगेंगे।

दुबलापन दूर करने के उपाय

छुहारा (खजूर)

हम भोजन में यूं तो कई पदार्थ खाते हैं, लेकिन कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं, जिन्हें मौसम विशेष के अलावा वर्षभर प्रयोग किया जा सकता है। ऐसे ही पदार्थों की जानकारी इस कॉलम के माध्यम से हम देना चाहते हैं। इस बार खारक के संबंध में जानिए।

छुहारे को खारक भी कहते हैं। यह पिण्ड खजूर का सूखा हुआ रूप होता है, जैसे अंगूर का सूखा हुआ रूप किशमिश और मुनक्का होता है। छुहारे का प्रयोग मेवा के रूप में किया जाता है। इसके मुख्य भेद दो हैं- 1. खजूर और 2. पिण्ड खजूर।

गुण : यह शीतल, रस तथा पाक में मधुर, स्निग्ध, रुचिकारक, हृदय को प्रिय, भारी तृप्तिदायक, ग्राही, वीर्यवर्द्धक, बलदायक और क्षत, क्षय, रक्तपित्त, कोठे की वायु, उलटी, कफ, बुखार, अतिसार, भूख, प्यास, खांसी, श्वास, दम, मूर्च्छा, वात और पित्त और मद्य सेवन से हुए रोगों को नष्ट करने वाला होता है। यह शीतवीर्य होता है, पर सूखने के बाद छुहारा गर्म प्रकृति का हो जाता है।

परिचय : यह 30 से 50 फुट ऊंचे वृक्ष का फल होता है। खजूर, पिण्ड खजूर और गोस्तन खजूर (छुहारा) ये तीन भेद भाव प्रकाश में बताए गए हैं। खजूर के पेड़ भारत में सर्वत्र पाए जाते हैं। सिन्ध और पंजाब में इसकी खेती विशेष रूप से की जाती है। पिण्ड खजूर उत्तरी अफ्रीका, मिस्र, सीरिया और अरब देशों में पैदा होता है। इसके वृक्ष से रस निकालकर नीरा बनाई जाती है।

रासायनिक संघटन : इसके फल में प्रोटीन 1.2, वसा 0.4, कार्बोहाइड्रेट 33.8, सूत्र 3.7, खनिज द्रव्य 1.7, कैल्शियम 0.022 तथा फास्फोरस 0.38 प्रतिशत होता है। इस वृक्ष के रस से बनाई गई नीरा में विटामिन बी और सी पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। कुछ समय तक रखने पर नीरा मद्य में परिणत हो जाती है। पके पिण्ड खजूर में अपेक्षाकृत अधिक पोषक तत्व होते हैं और शर्करा 85 प्रतिशत तक पाई जाती है।

उपयोग : खजूर के पेड़ से रस निकालकर 'नीरा' बनाई जाती है, जो तुरन्त पी ली जाए तो बहुत पौष्टिक और बलवर्द्धक होती है और कुछ समय तक रखी जाए तो शराब बन जाती है। इसके रस से गुड़ भी बनाया जाता है। इसका उपयोग वात और पित्त का शमन करने के लिए किया जाता है।
यह पौष्टिक और मूत्रल है, हृदय और स्नायविक संस्थान को बल देने वाला तथा शुक्र दौर्बल्य दूर करने वाला होने से इन व्याधियों को नष्ट करने के लिए उपयोगी है। कुछ घरेलू इलाज में उपयोगी प्रयोग इस प्रकार हैं-

दुर्बलता : 4 छुहारे एक गिलास दूध में उबाल कर ठण्डा कर लें। प्रातः काल या रात को सोते समय, गुठली अलग कर दें और छुहारें को खूब चबा-चबाकर खाएं और दूध पी जाएं। लगातार 3-4 माह सेवन करने से शरीर का दुबलापन दूर होता है, चेहरा भर जाता है, सुन्दरता बढ़ती है, बाल लम्बे व घने होते हैं और बलवीर्य की वृद्धि होती है। यह प्रयोग नवयुवा, प्रौढ़ और वृद्ध आयु के स्त्री-पुरुष, सबके लिए उपयोगी और लाभकारी है।

घाव और गुहेरी : छुहारे की गुठली को पानी के साथ पत्थर पर घिसकर, इसका लेप घाव पर लगाने से घाव ठीक होता है। आंख की पलक पर गुहेरी हो तो उस पर यह लेप लगाने से ठीक होती है।

शीघ्रपतन : प्रातः खाली पेट दो छुहारे टोपी सहित खूब चबा-चबाकर दो सप्ताह तक खाएं। तीसरे सप्ताह से 3 छुहारे लेने लगें और चौथे सप्ताह से चार छुहारे खाने लगें। चार छुहारे से ज्यादा न लें। इस प्रयोग के साथ ही रात को सोते समय दो सप्ताह तक दो छुहारे, तीसरे सप्ताह में तीन छुहारे और चौथे सप्ताह से बारहवें सप्ताह तक यानी तीन माह पूरे होने तक चार छुहारे एक गिलास दूध में उबाल कर, गुठली हटा कर, खूब चबा-चबा कर खाएं और ऊपर से दूध पी लें। य प्रयोग स्त्री-पुरुषों को अपूर्व शक्ति देने वाला, शरीर को पुष्ट और सुडौल बनाने वाला तथा पुरुषों में शीघ्रपतन रोग को नष्ट करने वाला है। परीक्षित है।

दमा : दमा के रोगी को प्रतिदिन सुबह-शाब 2-2 छुहारे खूब चबाकर खाना चाहिए। इससे फेफड़ों को शक्ति मिलती है और कफ व सर्दी का प्रकोप कम होता है। 

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

ज्योत्षी हथेली पढ़ने कि हस्तरेखा कला 03

गर्भावस्था के दौरान ही शिशु के हाथ में लकीरो का जाल बुन जाता है, जो कि जन्म से लेकर मृत्यु तक रेखाओ के रुप में विद्यमान रहता है। इसे हस्त रेखा (Palm line) के रुप में जाना जाता है। सामान्यतया 16 वर्ष तक की आयु के बच्चो की हाथों की रेखाओ में परिवर्तन होता रहता है।

सोलह वर्ष की आयु होने पर मुख्य रेखाएँ (जीवन रेखा, भाग्य रेखा इत्यादि) (Life line, Fortune line) स्थिर हो जाती है तथा कर्मो के अनुसार अन्य छोटे-बडे परिवर्तन होते रहते हैं। तथा ये परिवर्तन जीवन के अंतिम क्षण तक होते रहते हैं (Life line keep on changing throughout life)।
चूंकि हस्त रेखा (Samudrik Shastra)
विज्ञान कर्मो के आधार पर टिका है, इसलिए मनुष्य जैसे कर्म करता है वैसा ही परिवर्तन उसके हाथ की रेखाओ में हो जाता है (Palmistry stand by our work, palm line change with them)। हाथ का विश्लेषण करते समय सबसे पहले हम हाथ की बनावट को देखते हैं तत्पश्चात यह देखा जाता है कि हाथ मुलायम है या सख्त।आम तौर पर पुरुषो का दायाँ हाथ तथा स्त्रियों का बायाँ हाथ देखा जाता है।यदि कोइ पुरुष बायें हाथ से काम करता है तो उसका बायाँ हाथ देखा जाता है। हाथ में जितनी कम रेखाऎं होती हैं, भाग्य की दृष्टि से हाथ उतना ही सुन्दर माना जाता है (Lots of Palm line are not good for Fortune)।

हाथ में मुख्यतः चार रेखाओ का उभार स्पष्ट रुप से रहता है( We can see four main line in palm)
जीवन रेखा (Life Line)
जीवन रेखा हृदय रेखा के ऊपरी भाग से शुरु होकर आमतौर पर मणिबन्ध पर जाकर समाप्त हो जाती है (Life line start from heart line and end on Manibandh line)। यह रेखा भाग्य रेखा के समानान्तर चलती है, परन्तु कुछ व्यक्तियो की हथेली में जीवन रेखा हृदय रेखा में से निकलकर भाग्य रेखा में किसी भी बिन्दु पर मिल जाती है।जीवन रेखा तभी उत्तम मानी जाती है यदि उसे कोइ अन्य रेखा न काट रही हो तथा वह लम्बी हो इसका अर्थ है कि व्यक्ति की आयु लम्बी होगी तथा अधिकतर जीवन सुखमय बीतेगा। रेखा छोटी तथा कटी होने पर आयु कम एंव जीवन संघर्षमय होगा(If there is breakage in life line or there is any cut it means your life is short and in struggle)।

भाग्य रेखा:(Fate Line)
हृदय रेखा के मध्य से शुरु होकर मणिबन्ध तक जाने वाली सीधी रेखा को भाग्य रेखा कहते हैं (Straight Line start from middle of heart and end on Manibandh line called fate line) ।स्पष्ट रुप से दिखाई देने वाली रेखा उत्तम भाग्य का घौतक है।यदि भाग्य रेखा को कोइ अन्य रेखा न काटती हो तो भाग्य में किसी प्रकार की रुकावट नही आती।परन्तु यदि जिस बिन्दु पर रेखा भाग्य को काटती है तो उसी वर्ष व्यक्ति को भाग्य की हानि होती है।कुछ लोगो के हाथ में जीवन रेखा एंव भाग्य रेखा में से एक ही रेखा होती है।इस स्थिति में वह व्यक्ति आसाधारण होता है, या तो एकदम भाग्यहीन या फिर उच्चस्तर का भाग्यशाली होता है (If there is no fortune line on your palm it means you are not a middle class)। ऎसा व्यक्ति मध्यम स्तर का जीवन कभी नहीं जीता है।


हृदय रेखा: (Heart Line)
हथेली के मध्य में एक भाग से लेकर दूसरे भाग तक लेटी हुई रेखा को हृदय रेखा कहते हैं (Vertical line starts from middle of palm and end on heart line called heart line)। यदि हृदय रेखा एकदम सीधी या थोडा सा घुमाव लेकर जाती है तो वह व्यक्ति को निष्कपट बनाती है। यदि हृदय रेखा लहराती हुई चलती है तो वह व्यक्ति हृदय से पीडित रहता है।यदि रेखा टूटी हुई हो या उस पर कोइ निशान हो तो व्यक्ति को हृदयाघात हो सकता है(There is Chance of heart attack if heart line is break)।

मस्तिष्क रेखा:(Brain Line)
हथेली के एक छोर से दूसरे छोर तक उंगलियो के पर्वतो तथा हृदय रेखा के समानान्तर जाने वाली रेखा को मस्तिष्क रेखा कहते हैं (Parallel line to heart line is called mind line)। यह आवश्यक नहीं कि मस्तिष्क रेखा एक छोर से दूसरे छोर तक (हथेली) जायें, यह बीच में ही किसी भी पर्वत (Planetary Mounts) की ओर मुड सकती है। यदि हृदय रेखा और मस्तिष्क रेखा आपस में न मिलें तो उत्तम रहता है (Brain line is good if mind line or heart line are not together)। स्पष्ट एंव बाधा रहित रेखा उत्तम मानी जाती है। कई बार मस्तिष्क रेखा एक छोर पर दो भागों में विभाजित हो जाती है। ऎसी रेखा वाला व्यक्ति स्थिर स्वभाव का नहीं होता है, सदा भ्रमित रहता है।
लाल किताब में सामुद्रिक ज्ञान यानी पामिस्ट्रि (Palmistry) के आधार पर व्यक्ति की जन्मकुण्डली का निर्माण होता है, तथा जिन व्यक्तियो को अपनी जन्मतिथि तथा जन्म समय मालूम नही उनके लिए लाल किताब बहुत लाभकारी है।


विज्ञान और आलोचना 

इस तरह के सच को तर्क की कसौटी पर कसने वाले लोग (स्केप्टिक्स) अक्सर हस्तरेखाविदों को कथित मानसशास्त्री की श्रेणी में रखते हैं, "कोल्ड रीडिंग" नाम की तकनीक का प्रयोग करते हैं. कोल्ड रीडिंग को एक ऐसा अभ्यास माना जाता है जिसमें हस्तरेखाविदों सहित सभी प्रकार के रेखा अध्‍ययनकर्ताओं को मानसशास्त्री के समक्ष पेश होना पड़ता है.
एक थोड़े व्यापक रूप से स्वीकार्य खोज के मुताबिक हस्तरेखा शास्त्र की सटीकता को चरित्र विश्लेषण की एक प्रणाली के रूप में स्वीकार किया गया है और अभी तक निर्णायक सबूत नहीं मिला है कि हथेली की रेखाओं और व्यक्ति के चरित्र के बीच कोई संबंध होता है. 

Source: shvoong.com